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कोटा को लगी किसकी नजर…’कोचिंग हब’ या ‘खुदकुशी का शहर’….?

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जयपुर / नई दिल्ली (गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र) :  कोटा को क्या किसी की नज़र लग गई है?  नीट की तैयारी कर रही रांची से आने वाली एक बच्ची ने मंगलवार को आत्महत्या कर ली। इस साल जनवरी से अब तक कोटा के कोचिंग सेंटरों में नीट और इंजीनयरिंग की तैयारी करने वाले 24 बच्चों ने खुदकुशी कर ली है। इसका मतलब ये हुआ कि हर महीने लगभग तीन बच्चों ने आत्महत्या की। ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं।

राजस्थान के शिक्षा मंत्री बी.डी. कल्ला ने इस घटना के बाद राज्य सरकार की तरफ से इस मामले में कोचिंग सेंटरों के खिलाफ कड़े कदम उठाने के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि, हर मौत के वजह की जांच की जाएगी। उन्होंने ये भी बताया कि राजस्थान सरकार ने पहले ही ऐसे मामलों की वजहों की तह तक पहुंचने के लिए एक विशेष जांच  दल का गठन कर दिया है और उसने अपना काम शुरू कर दिया है।

आपको ये भी बता दें कि कुछ समय पहले कोटा में जिलाधिकारी के निर्देश पर सभी पीजी और छात्रावासों में नए तरह के सीलिंग फैन्स लगाने के निर्देश दिए गए थे। इन सीलिंग फैंस को एक स्प्रिंग के जरिए इंस्टॉल किया जाता है जिसमें अगर कोई पंखे पर लटक कर जान देना चाहे तो स्प्रिंग की वजह से पंखा नीचे आ जाता है और पंखे पर लटक कर जान देना संभव नहीं हो पाता।

कोचिंग हब कोटा

कोटा में इस समय हजार की तादाद में छोटे बड़े कोचिंग सेंटर चल रहे हैं। देश के करीब ढाई लाख बच्चे यहां नीट और जी जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए कोचिंग ले रहे हैं। यही नहीं स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी कोचिंग संस्थानों और बाहरी छात्रों का बहुत बड़ा योगदान है। कोचिंग के लिए यहां आने वाले अधिकतर छात्र बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के होते हैं और ये मध्यम या निम्न मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। इन छात्रों पर अपने आर्थिक परिवेश की वजह से जबरदस्त मानसिक दबाव होता है और वे इसी दबाव में अतिवादी कदम उठा लेते हैं।

मनोवैज्ञानिक रवि सिसोदिया ने कोटा की घटनाओं पर काफी गहराई से अध्ययन किया है। उनका कहना है कि ‘कोटा में कोचिंग छात्रों की खुदकुशी की घटनाएं बच्चों पर बेहद मानसिक दबाव का नतीजा हैं। वे कहते हैं कि बच्चों पर एक तरफ मां-बाप की उम्मीदों का पहाड़ होता है तो दूसरी तरफ कोचिंग सेंटरों में अपना नंबर बढ़ाने की प्रतिस्पर्धा के बीच छात्रों पर बेहतर से बेहतर प्रदर्शन का दबाव। छात्र तो सैंडविच बन कर रह जाता है।’

सिसोदिया के अनुसार, ‘बहुत से ऐसे बच्चे भी होते हैं जिनके मां-बाप ने अपनी जमीन और गहने-जेवर बेच कर बच्चे को कोचिंग के लिए भेजा है, वे असफलता को झेल नहीं पाते और आत्महत्या जैसे कदम उठाने के लिए बाध्य हो जाते हैं।’ उनके अनुसार, ‘इसके लिए कोचिंग सेंटर भी काफी  हद तक जिम्मेदार होते हैं। वे मां-बाप को सब्जबाग दिखा कर बच्चे का दाखिला करना लेते हैं। मोटी फीस और रहने-खाने के खर्च में मोटा कमीशन अलग से उनकी जेब में जाता है। वे अपने इंटरनल एग्जाम के पैरामीटर के आधार पर ही बच्चे को नीट या जी में अपीयर होने देते हैं और बहुत से बच्चों को वे परीक्षा ही नहीं देने देते। कई बच्चे को सालों-साल इसी चक्कर में बर्बाद करते हैं।’ सिसोदिया कहते हैं कि, ‘कोटा में संगठित लूट का खेल चल रहा है और सब तमाशबीन बने हुए हैं।’

रहस्यमयी राजनीतिक चुप्पी

कोटा में बच्चों की आत्महत्या के मामलों को देखते हुए राजस्थान सरकार ने पिछले दिनों कुछ तेजी दिखाई और राज्य सरकार से लेकर स्थानीय प्रशासन ने अपनी तरफ से कुछ कदम उठाए। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एक जांच कमेटी बनाई और कोचिंग सेंटरों की इंटरनल परीक्षाओं पर रोक लगा दी गई। जिला प्रशासन ने भी काउंसलिंग से लेकर समन्वय तक के लिए कुछ दिशानिर्देशों को आवश्यक बना दिया है। लेकिन अचंभे वाली बात ये है कि कोटा को लेकर देश भर में भले ही चर्चा हो रही हो लेकिन स्थानीय सांसद और लोकसभा के स्पीकर ओम बिड़ला ने इस मामले में अभी तक मुंह नहीं खोला है। ऐसे संजीदा मामले पर उनकी खामोशी में कौन सा राजनीतिक संदेश छिपा है इसे वे ही बेहतर बता सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक मसलों के विशेषज्ञ ज्ञानेश विकास के अनुसार, ‘कोटा के कोचिंग सेंटर न सिर्फ आर्थिक रूप से बल्कि राजनीतिक रूप से भी काफी असर रखते हैं इसीलिए आमतौर पर राजनेता इनके खिलाफ मुंह नहीं खोलते।’

सोशल एक्टिविस्ट शानू चौबे ने उठाया बीड़ा

ओम बिड़ला जैसे राजनेता भले चुप्पी साध लें लेकिन कोटा की घटनाओं को लेकर सोशल एक्टिविस्ट शानू चौबे ने कमर कस ली है। शानू एक वरिष्ठ प्रशासनिक अफसर की पत्नी हैं और वे कोटा की ही रहने वाली हैं। उनका कहना है कि, ‘कोटा में जो कुछ हो रहा है उससे हमारे शहर की बदनामी हो रही है। ऐसा क्यों हो रहा है हमें इसे समझना होगा, हालात को संभालने के लिए कदम उठाएं जाएं, इसके लिए प्रयास करना होगा। हम ये काम करेंगे।’ उन्होंने कहा कि, ‘आत्महत्या के पीछे की विवशता को समझने की जरूरत है, हम उन बच्चों के साथ खड़े हैं। हमारी कोशिश उन सब बच्चों तक पहुंचने की है जो कोटा में कोचिंग के लिए आए हैं और किसी परेशानी में हैं।’

शानू चौबे के अनुसार, ‘अगले कुछ दिनों में हम कोटा में कोचिंग ले रहे बच्चों और कोचिंग संस्थानों से संवाद स्थापित करने के लिए संपर्क अभियान चलाने जा रहे हैं। हमारी कोशिश अभिभावकों को भी इस मुहिम का हिस्सा बनाने की है। बच्चों की काउंसलिंग के साथ मां-बाप और कोचिंग संस्थानों को भी इससे जोड़ने की जरूरत हैं। हमारा प्रयास इस मामले में राज्य सरकार से सहायता और सहयोग लेने का भी रहेगा ताकि हम अपने काम को बखूबी अंजाम दे सकें। हम कोटा को बदनाम नहीं होने देंगे।’

फोटो सौजन्य़- सोशल मीडिया      

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