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पहचान कौन……मैं दिल्ली….

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नई दिल्ली (गणतंत्र भारत के लिए नगमा) : दिल्ली में ठंड की दस्तक के साथ ही यहां की आबोहवा जहरीली हो जाती है। दिवाली और आसपास के राज्यों में पराली जलाने से हालात और खराब हो जाते हैं। वाहन और उद्योगों का प्रदूषण तो पहले से ही दिल्ली की सांसत की वजह बना हुआ है। सरकारें दिखावे के लिए प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए कुछ-कुछ करने का दावा करती रहती है। ऑड-इवेन, पटाखा फोड़ने पर रोक, पराली जलाने पर प्रतिबंध जैसे कुछ कदम हर साल उठाए जाते हैं। थोड़ा बहुत हालात सुधऱने पर फिर हालात खराब होने का इंतजार शुरू हो जाता है।

अदालतें और नेशनल ग्रीन ट्राइब्यूनल भी इस मामले में कभी कभी सरकारों को चेताते रहते हैं लेकिन सारी बातें रस्मी ज्यादा गंभीर कम होती हैं।

दिल्ली की आबोहवा एक बार फिर खराब है। दिवाली के बाद तो हालात इतने खराब थे कि सांस लेना भी मुश्किल था। एक्यूआई लेवल 999 पहुंच था। शाय़द इससे भी ज्यादा था लेकिन मशीन इस लेवल से ज्यादा नाप ही नहीं पाती। यही हाल दिल्ली से सटे गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद जैसे शहरों का भी था। टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक बहस छिड़ गई। रोक के बावजूद पटाखे छुड़ाने पर सारा ठीकरा फोड़ दिया गया। पराली जलाने से प्रदूषण पहले से बढ़ ही रहा था। दिल्ली के परिवहन मंत्री गोपाल राय ने प्रदूषण से निपटने के लिए आपात बैठक बुलाने की मांग कर डाली। दिल्ली सरकार ने प्रदूषण कम करने के लिए पानी का छिड़काव और स्मॉग टावर के इस्तेमाल जैसे कदम उठा लिए।

ये कवायदें और ऐसी कोशिशें दिल्ली में हर साल होती है। हर साल कुछ समय तक रवायती तौर पर प्रदूषण का स्यापा चलता है फिर सब चंगा सी। ऐसा क्यौं है ? क्या सचमुच सरकारें दिल्ली की आबोहवा को लेकर गंभीर हैं या ये सिर्फ कुछ दिनों का तमाशा है।

दिल्ली में सबसे ज्यादा प्रदूषण वाहनों से हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई को मिला दिया जाए तो उतने वाहन अकेले दिल्ली में हैं। पडोसी राज्यों से आने वाली फ्लोटिंग पॉपुलेशन अलग से है। उनके वाहनों का प्रदूषण अलग से है।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लगातार जारी निर्माण गतिविधियों से होने वाला प्रदूषण नंबर दो पर आता है। इसके बाद सीजनल रूप से पराली का प्रदूषण। और कोढ़ में खाज का काम करते हैं दिवाली पर पटाखें।

सवाल ये है कि, जब प्रदूषण के कारण और पैटर्न पता हैं तो क्यों नहीं समय रहते प्रदूषण से निपटने के लिए कदम उठाए जाते। पराली के निस्तारण के लिए क्यों नहीं एक ठोस और बाध्यकारी नीति बनाई जाती। वाहन प्रदूषण को क्यों गंभीरता से नहीं लिया जाता। एनजीटी ने एक बार दिल्ली में बड़े डीजल वाहनों पर रोक लगाई तो मामला तुरंत सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया और वहा से इस आदेश पर रोक लगा दी गई। निर्माण गतिविधियों को दिल्ली में प्रदूषण को देखते हुए मौसम के हिसाब से बंद क्यों नहीं रखा जा सकता। ऐसे कई सवाल हैं जो सरकारों की चिंता और उनकी सोच की हकीकत को सामने लाते हैं।

प्रदूषण का बाजार

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के शहरों में एक समय बिजली की भीषण किल्लत हुआ करती थी। डीजल के जेनसेट आबोहवा में जहर उगलते रहते थे। इनवर्टर से घरों की बिजली का काम चलता था। इंनवर्टर और जेनसेट कारोबार खूब फलाफूला। कारोबरियों ने जम कर कमाया। अब बात थोड़ा और आगे की। दिल्ली की हवा ही जहरीली बन गई। अब बाजार में स्मॉग टावर और घरों के लिए एयर प्योरीफायर का धंधा जोरों से चल रहा है। बिजली नहीं तो इंनवर्टर और जेन सेट है, हवा जहरीली है तो एयर प्योरीफायर है। मतलब मरीज का इलाज होगा लेकिन मर्ज को जस का तस बनाए रखेंगे। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली में एयर प्योरी फायर का बाजार पिछले पांच सालों में 10 गुमा बढ़ गया है।

सरकार न तो ऑटोमोबाइल बाजार को नियंत्रित कर सकती है, न बिल्डर लॉबी को काबू कर सकती है जो समस्या की जड़ हैं।

बीजिंग में प्रदूषण का स्तर 400 पार गया तो वहां स्कूल से लेकर  निर्माण गतिविधियां तक सब बंद लेकिन दिल्ली में तो ये आम दिनों का प्रदूषण स्तर है। सरकारें बातें तो बड़ी बड़ी करती हैं लेकिन वे प्रदूषण को लेकर सचमुच कितनी गंभीर हैं ये अपने आप में एक सवाल है।

फोटो सौजन्य – सोशल मीडिया   

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