Homeपरिदृश्यटॉप स्टोरीक्या ईडी सचमुच ‘एजेंडाधारी’ है, क्या कहते हैं तथ्य ?

क्या ईडी सचमुच ‘एजेंडाधारी’ है, क्या कहते हैं तथ्य ?

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नई दिल्ली 01 अगस्त ( गणतंत्र भारत के लिए शोध डेस्क ): प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉंड्रिंग एक्ट के प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह का फैसला दिया है उस पर एक नई बहस शुरू हो गई है। विपक्षी दल आरोप लगा रहे हैं कि सरकार इस कानून का इस्तेमाल अपने राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए ज्यादा कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट की 3 सदस्यीय बेंच ने प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के प्रावधानों और ईडी के गिरफ्तार करने के अधिकार को बरकरार रखा और आरोपियों की संपत्ति जब्ती, तलाशी और गिरफ्तारी को सही ठहराया। फैसला सुनाने वाली बेंच में जस्टिस ए. एम खानविल्कर, दिनेश माहेश्वरी और  सी टी रविकुमार थे।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इन कानूनों के तहत जमानत के सख्त प्रावधानों को भी बरकरार रखा जिसमें सबूत पेश करने की जिम्मेदारी आरोपी पर ही है। हालांकि नवंबार 2017 में सुप्रीम कोर्ट के दिए अपने ही फैसले के खिलाफ है जिसमें उसने जमानत की इस शर्त को असंवैधानिक बताया था।

दरअसल, इन कानूनों के तहत जो सख्त प्रावधान हैं उनके इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए देश भर से करीब 241 याचिकाएं दी गई थीं। याचिका देने वालों में विपक्ष के कई नेता भी शामिल थे। इनमें कांग्रेस नेता कार्ति चिदंबरम, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती  भी शामिल हैं।

क्या कहते हैं तथ्य ?

संसद के रिकॉर्ड के हिसाब से ईडी  ने 2004 से 2014 के बीच 112 छापे मारे और 2014 से 2022 के बीच 3000 रेड कीं। सरकारी डेटा के अनुसार पिछले 17 साल में इस कानून के तहत जो भी केस किए गए उनमें से सिर्फ आधे प्रतिशत ही दोषी पाए गए और उन्हें सजा मिली।

ईडी के चपेटे में कौन-कौन ?

शिवसेना नेता संजय राउत के ताजा मामले के अलावा कांग्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी, राहुल गांधी, पी चिदंबरम, कर्नाटक कांग्रेस के नेता डीके शिव कुमार, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी, एनसीपी  नेता अजित पवार, नवाब मलिक, दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन और कई दूसरे नेताओं के खिलाफ इस कानून के तहत कार्रवाई जारी है।

विपक्ष के आरोपों में कितना दम ?

शिव सेना नेता संजय राउत गिरफ्तार तो अभी हुए हैं लेकिन कुछ समय़ पहले ही उन्होंने दावा किया था कि उन्हें बीजेपी ने पार्टी में शामिल होने का न्यौता दिया था। उनका आरोप है कि जिस दिन मैंने इससे इनकार किया उसी दिन से ईडी ने मुझे, मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों को परेशान करना शुरू कर दिया।

इसी तरह के आरोप दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी लगा रहे हैं। उन्होंने बाकायदा प्रेस कॉंफ्रेंस करके आरोप भी लगाया है कि अब दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ईडी के निशाने पर हैं और जल्द ही उनकी गिरफ्तारी संभव है।

विपक्ष का दावा है कि सरकार ईडी और दूसरी जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक उद्देश्यों के लिए कर रही है और उसके खुद के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं। उसका कहना है कि, ईडी किसी पर भी आरोप लगाकर उसे मानसिक और आर्थिक तौर पर परेशान कर सकती है और अदालत से बेगुनाह साबित होने तक किसी के भी राजनीतिक करियर को दागदार बना सकती है। विपक्ष का आरोप है ईडी की सभी कार्रवाई सिर्फ विपक्षी नेताओं पर ही हो रही है। कोई भी विपक्षी नेता जो बीजेपी में शामिल हो गया वो दूध का धुला हो गया। असम के मुख्यमंत्री हेमंता विश्वसर्मा, कर्नाटक में येदियुरप्पा और इसी तरह से पश्चिम बंगाल में मुकुल रॉय और सुवेंदु अधिकारी पर आरोपों के बावजूद बीजेपी में जाने पर कार्रवाई को दबा दिया गया।

पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मैथ्यू ज़ॉर्ज का कहना है कि, सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से सरकार को वो हथियार मिल गया है जिसके जरिए वो कानूनी हवाला देकर अपने विरोधियों को परेशान और बदनाम कर सकती है। कन्विक्शन रेट अपने आप में सब कुछ बता रहा है।

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया

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