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देश में अभिव्यक्ति क्या सचमुच ‘आजाद’ है ? सच-झूठ के फर्क को समझना होगा

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नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र):  अभिव्यक्ति की आजादी के संदर्भ को लिया जाए तो मौजूदा समय में तीन बड़ी खबरें हैं। पहली, उत्तर प्रदेश में प्रतापगढ़ के पत्रकार सुलभ श्रीवास्तव की मौत, दूसरी, 13 जून को भारत सरकार का जी -7  समिट  में ‘ओपन सोसाइटी’ को प्रमोट करने वाले ज्वाइंट स्टेटमेंट पर हस्ताक्षर। ये ज्वाइंट स्टेटमेंट ऑनलाइन और ऑफलाइन ,दोनों रूपों में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को ऐसी आजादी के रूप में बढ़ावा देता है जो लोकतंत्र को मजबूत करती है और लोगों के जीवन को भय तथा उत्पीड़न से मुक्त रखने में मदद करती है। तीसरा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर को नियमों की आड़ में इस तरह से घेरना कि उस पर दबाव बनाया जा सके।

तीनों में से दो खबरें ऐसी हैं जो देशज होने के साथ भारत में पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति का आइना दिखाती हैं और ये बताती हैं कि मौजूदा दौर में भारत में पत्रकारिता और सही बात को रखना कितना मुश्किल होता जा रहा है। जबकि जी-7 से जुड़ी खबर में पत्रकारिता के उन सिद्धांतों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता जताई गई है जो अभिव्यक्ति की आजादी को बढ़ावा देने के साथ भय और उत्पीड़न से मुक्त सामाजिक जीवन की बात करते हैं।   

सुलभ श्रीवास्तव की मौत और पत्रकारों पर मामले

एबीपी न्यूज़ के जिला संवाददाता सुलभ श्रीवास्तव की मौत दुर्घटना में हुई या उनकी हत्या की गई, ये अभी साफ नहीं है। लेकिन, जिस तरह से सुलभ ने एक दो दिन पहले एडीजी को पत्र लिखा था और उसमें शराब माफिया की तरफ से उन्हें मिल रही धमकी का जिक्र किया था, उससे इतना तो साफ है कि ये मामला दुर्घटना का कम हत्या का ज्यादा लग रहा है। शक की सुई कुंडा की तरफ है। पुलिस इसे दुर्घटना बता रही है लेकिन सुलभ की पत्नी की शिकायत पर उसने अज्ञात लोगों के खिलाफ धारा 302 में हत्या का मामला दर्ज कर लिया है।

मामले पहले भी दर्ज होते रहे हैं लेकिन क्या इससे देश और य़ूपी में पत्रकारों का उत्पीड़न बंद हुआ। हाथरस कांड की रिपोर्टिंग के लिए जाते हुए केरल के पत्रकार कप्पन को यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया था। वे अभी भी जेल में बंद हैं। उन पर गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। मिर्जापुर के एक पत्रकार को डीएम साहब ने हनक में आकर बंद करा दिया क्योंकि उसने मिडडे मील की हकीकत सबके सामने रख दी थी।

ऐसे तमाम मामले हैं जो भारत के मौजूदा दौर की हकीकत को बयां करते हैं। पत्रकार विनोद दुआ पर देशद्रोह का मामला, आंध्र प्रदेश के दो टीवी चैनलों पर देशद्रोह का मामला और उत्तर –पूर्व के पत्रकार पर देशद्रोह का केस सब हाल फिलहाल के मामले हैं। ये देश में अभिव्यक्ति की आजादी की हकीकत है।

ट्विटर पर दबाव

सोशल मीडिया के इस मंच पर इन दिनों सरकार के खिलाफ काफी कुछ लिखा पढ़ा जा रहा था। भारत सरकार ने ट्विटर से इसके खिलाफ कदम उठाने को कहा। काफी पोस्ट हटवाई भी गईं, लेकिन उतने भर से बात बनी नहीं। नए नियमों का हवाला देकर ट्विटर के वरिष्ठ अधिकारियों को भारत में बैठने के लिए दबाव बनाया गया ताकि बात ना मानने पर गर्दन को पकड़ा जा सके। ट्विटर से लेकर तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर विभिन्न राजनेताओं के खिलाफ ऊटपटांग बातें चलती रहती हैं लेकिन भारत में सत्तारूढ़ दल को अपने खिलाफ होने वाली ऐसी हरकत मंजूर नहीं और ट्विटर पर दबाव बनाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए गए। क्या सरकार ने विपक्षी दलों के नेताओं पर की गई भद्दी टिप्पणियों पर ट्विटर से कार्रवाई की मांग कभी की। सरकार को इस सवाल का जवाब भी देना चाहिए।    

चेहरे पर चेहरा

अब देश मे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर पाखंड का चेहरा देखिए। 13 जून को भारत सरकार ने जी -7  समिट  में ‘ओपन सोसाइटी’ को प्रमोट करने वाले ज्वाइंट स्टेटमेंट पर हस्ताक्षर किए। ये ज्वाइंट स्टेटमेंट ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों रूपों में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को ऐसी आजादी के रूप में बढ़ावा देता है जो लोकतंत्र को मजबूत करती है और लोगों के जीवन को भय तथा उत्पीड़न से मुक्त रखने में मदद करती है। भारत में पत्रकारों के उत्पीड़न और उन पर दबाव की खबरों के बीच दरअसल ऐसा करके, भारत सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को ये संदेश देने की कोशिश की कि दुनिया के तमाम दूसरे लोकतंत्रों की तरह से भारत में भी अभिव्यक्ति को काफी महत्व दिया जाता है।

गौर करने लायक बात ये हैं कुछ समय पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने भारत सरकार को मीडिया पर देशद्रोह के कानून के इस्तेमाल को लेकर फटकार लगाई थी और साफ किया था कि सरकार की आलोचना का मतलब ये कतई नहीं होता कि ये देशद्रोह का मामला है।

आंकड़ों पर गौर करना जरूरी है

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में जो आंकड़े पेश किए उसके अनुसार साल 2016 से 2019 के बीच दर्ज यूएपीए के केवल 2.2 प्रतिशत  मामलों में ही आरोपी को सजा हो पाई। 2014 के बाद इस आतंकविरोधी कानून के अंतर्गत हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या में भारी वृद्धि देखने को मिली है। अब देशद्रोह के मामलों  को लीजिए। नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों से स्पष्ट है कि 96 प्रतिशत  देशद्रोह के केस में आरोपी का दोष सिद्ध नहीं हुआ। 2016 से 2019 के बीच देशद्रोह के केस में कुल 96 गिरफ्तारियां हुई जिसमें से केवल 2 आरोपियों का ही दोष सिद्ध हुआ। इन मामलों मे गिरफ्तारियों में खतरनाक वृद्धि, चार्जशीट फाइल करने में देरी और दोष सिद्धि की गिरती दर सरकार की मंशा पर तमाम सवाल पैदा करती है।

भारत के आतंक विरोधी कानून-गैरकानूनी गतिविधियां( रोकथाम) कानून, (यूएपीए)  को मौजूदा सरकार ने संशोधित किया और उसका प्रयोग  पूरे देश में असंतोष को दबाने के लिए सबसे मजबूत हथियार के रूप में किया गया। इस कानून का जमकर इस्तेमाल  शिक्षाविदों, छात्रों ,पत्रकारों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ किया गया भले ही वे मामले अदालत में नहीं टिक पाए।

मोदी-योगी पर टिप्पणी भारी पड़ी

देशद्रोह के मामलों पर आर्टिकल 14 नामक पोर्टल पर भी दिलचस्प आंकड़े उपलब्ध हैं। इन आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में राजनेताओं और सरकार की आलोचना करने के लिए 405 भारतीयों के खिलाफ देशद्रोह के मामले दर्ज किए गए और उनमें से 96 प्रतिशत  मामले साल 2014 के बाद यानी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद दर्ज किए गए। इसमें 149 आरोपियों पर नरेंद्र मोदी के खिलाफ आलोचनात्मक या अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप था जबकि 144 लोगों पर यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ ऐसी टिप्पणी करने का आरोप था।

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया

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