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क्या फसल बीमा योजना से किसानों का मोह भंग हो रहा है ?

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नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र):

केंद्र सरकार ने 19 फऱवरी 2020 को कैबिनेट की बैठक मे प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को खरीफ सीजन से स्वैच्छिक कर दिया है। इससे पहले, कृषि कर्ज लेने वाले किसानों के लिए इस योजना में पंजीकृत होना अनिवार्य था। पिछले खरीफ सीजन में करीब 3 करोड़ 81 लाख किसान इस फसल बीमा योजना से जुड़े हुए थे लेकिन इस बार ये संख्या काफी कम होने का अनुमान है। आंकड़ों के मुताबिक 15 जुलाई तक इस योजना के लिए सिर्फ 85 लाख किसानों ने ही आवेदन दिया था।

प्रधाननंत्री फसल बीमा योजना की वेबसाइट के मुताबिक, मौजूदा खरीफ सीजन के लिए 15 जुलाई के बाद तक 85 लाख किसानों ने ही फसल बीमा के लिए अपना आवेदन बैंकों को दिया है। हालांकि अधिकतर राज्यों ने इस योजना के लिए आवेदन की आखिरी तारीख 31 जुलाई तय की थी लेकिन जिस तरह का रुख देखा जा रहा था उससे माना जा सकता है कि तय समय सीमा तक पिछले साल के मुकाबले बीमाकृत किसानों की संख्या काफी कम हो सकती है।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को अपनी उपलब्धियों में शामिल करने वाली नरेंद्र मोदी सरकार के लिए ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इसी साल जुलाई में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की समीक्षा बैठक की थी। इसमें उन्होंने इस योजना के बारे में किसानों को जागरूक करने पर जोर दिया। साथ ही फसल नुकसान के लंबित दावों का जल्द से जल्द भुगतान करने पर भी जोर दिया था।

आंकड़ों की माने तो फसल बीमा को स्वैच्छिक करने के बाद किसानों ने तेजी के साथ इस य़ोजना से दूरी बनानी शुरू कर दी है। इससे पहले वैसे सभी किसान जो बैंकों से कृषि कर्ज लेते थे वे खुद ब खुद ही इसके दायरे में आ जाते थे। लेकिन 19 फरवरी, 2020 को केंद्रीय कैबिनेट ने किसानों को खरीफ सीजन से इस बात की छूट दी कि वे इस योजना में शामिल होने या न होने का फैसला खुद ले सकते हैं।

इस योजना से किसानों की बेरुखी की वजह क्या है ?

उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के गांव नंदापुर के किसान रामचंद्र ने बताया कि, उसने अर्जी लगा कर बैंक को सूचित कर दिया कि उसे फसल बीमा नहीं लेना है। रामचंद्र की शिकायत है कि उन्हें ये पाता ही चलता कि उसके प्रीमियम का पैसा गया कहां। इंश्योरेंस का कोई फायदा नहीं हो रहा। उनका कहना है कि, हम भी नुकसान में और सरकार भी नुकसान में। वे बताते हैं कि, पिछले साल बारिश और ओले से हमारी फसल चौपट हो गई। कृषि विभाग को बताया, कुछ लोग आए देख कर गए लेकिन बीमा आज तक नहीं मिला। उन्होंने खेती के लिए बैंक से कुछ रुपए कर्ज लिए थे इसलिए उस समय के नियमों के तहत उनके जरूरी था फसल बीमा लेना। लेकिन अब जबकि उनके पास बीमा नहीं लेने का विकल्प है उन्होंने तुरंत ही इस योजना से खुद को अलग कर लिया। रामचंद्र जैसे देश में लाखों किसान हैं।  

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

विशेषज्ञ मानते हैं कि इस योजना में कुछ बुनियादी खामियां हैं और उन्हें दूर करने की जरूरत है। पहली, सरकार को इस काम के लिए सार्वजनिक क्षेत्र की कृषि कंपनियों को आगे लाना चाहिए और उनके हाथ में योजना को अमल में लाने की जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए। निजी कंपनियों को इस क्षेत्र से बाहर ऱखा जाए। इसके अलावा जरूरी है कि किसानों को इस बारे में जागरूक किया जाए और उन्हें किसी भी तरह की दिक्क्त होने की स्थिति में जिला और तहसील स्तर पर जागरूकता और सहायता केंद्र बनाए जा सकते हैं जिसमें सरकारी कर्मचारियों के साथ एनजीओ को भी शामिल किया जाए। विशेषज्ञ इस बात पर जोर देते हैं कि अगर किसान का फायदा नहीं होगा तो वो क्यों इस योजना से जुड़ेगा। निजी कंपनियां तो बैंकों के साथ मिलकर किसानों को ही लूट रही है।

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