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देश में वन क्षेत्र बढ़ा, लेकिन, फॉरेस्ट रिपोर्ट पर विशेषज्ञ क्यों उठा रहे हैं सवाल ?

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नई दिल्ली (गणतंत्र भारत के लिए शोध डेस्क) :  भारत सरकार के पर्यावरण. वन और क्लाइमेंट चेंज मंत्रालय ने साल 2021 की फॉरेस्ट रिपोर्ट जारी कर दी है। रिपोर्ट में कई सकारात्मक और उत्साहजनक संकेतों का दावा किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, देश में 2019 के मुकाबले 1540 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की वृद्धि दर्ज की गई है और ये बढ़कर 7,13798 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हो गया है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 21.71 प्रतिशत क्षेत्र वन क्षेत्र हैं। भौगोलिक दृष्टि से देख जाए तो कुल 721 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में बढ़ोतरी हुई है। लेकिन विशेषज्ञो ने इस रिपोर्ट पर कई सवाल उठाए हैं और इसे सही परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत बताई है।

रिपोर्ट के सकारात्मक संकेत

रिपोर्ट में बताया गया है कि वन क्षेत्रों में बढ़ोतरी की दृष्टि से देश में तेलंगाना सबसे अव्वल है। तेलंगाना के वन क्षेत्र में 3.07 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। दूसरे नंबर पर आंध्र प्रदेश आता है जहां 2.22 प्रतिशक वन क्षेत्र बढ़ा है जबकि तीसरे नंबर पर ओडिशा का स्थान है और वहां 1.04 प्रतिशत वन क्षेत्र में बढोतरी हुई है।  

रिपोर्ट मे बताया गया है कि, वन क्षेत्र के आंकलन के लिए इसे तीन हिस्सो में बांटा जाता है। पहला, सघन या डेंस फॉरेस्ट, दूसरा, मॉडरेट डेंस फॉरेस्ट और तीसरा ओपन फॉरेस्ट।

रिपोर्ट के अनुसार, देश के कुल वन क्षेत्र का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा सघन वन क्षेत्र का है और इसमें 501 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की वृद्धि दर्ज की गई है। मॉडरेट डेंस फॉरेस्ट कुल वन क्षेत्र का 40 से 70 प्रतिशत तक है जबकि ओपन फॉरेस्ट 10-40 प्रतिशत तक माना जाता है। रिपोर्ट के आंकड़ों के हिसाब से मॉडरेट डेंस फॉरेस्ट क्षेत्र में 1582 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की कमी हुई है और ओपन फॉरेस्ट क्षेत्र में 2621 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की वृद्धि हुई है।   

चिंताजनक संकेत

रिपोर्ट में कई ऐसी बाते हैं जो वन क्षेत्रों को लेकर चिंता की वजह हैं। फॉरेस्ट रिपोर्ट बताती है कि देश के पूर्वोत्तर राज्यों मे वन क्षेत्रों में कमी आ रही है और अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर, मेघायल और नगालैंड में पिछले दो वर्षों ने वन क्षेत्र मे कमी आई है। उत्तर पूर्व के भौगोलिक क्षेत्रफल की बात की जाए तो ये देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 7.98 प्रतिशत है जबकि उस क्षेत्र का वन क्षेत्र 23.75 प्रतिशत है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 2 वर्षों मे इस इलाके में 1020 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की कमी दर्ज की गई।  

राज्यवार देखे तो सबसे ज्यादा वन क्षेत्र का नुकसान मिजोरम में हुआ है। यहां 84.5 प्रतिशत वन क्षेत्र में से 1.03 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।

रिपोर्ट बताती है कि पूर्वोंत्तर में वन क्षेत्र में कमी होने के कारण पिछले वर्षों में इस इलाके मे प्राकृतिक आपदाएं जैसे भूस्खलन और अतिवर्षा में काफी बढ़ोतरी देखने को मिली है। राज्य की कृषि पर भी इसका व्यापक असर देखने  मिला है।   

रिपोर्ट पर क्यों उठे सवाल

विशेषज्ञ इस रिपोर्ट पर कई तरह की आपत्तियां जताते हैं। पहला सवाल, वन क्षेत्रों में जैव विवधता को लेकर है। विशोषज्ञ मानते हैं कि प्राकृतिक वन के बदले कृत्रिम वन क्षेत्रों का विकास किया जा रहा है। कॉफी, नारियल और आम के पेडों से मीलों के वन क्षेत्र निर्धारित किए जा रहे हैं। ये गलत है। उनका कहना है कि प्राकृतिक वन क्षेत्रों में एक किलोमीटर के दायरे में 100 से ज्यादा प्रजातियो के वृक्ष हो सकते हैं। ये वन क्षेत्र जैव विविधता और पर्यावरण के लिहाज से उपयुक्त होते हैं।

दूसरा, रिपोर्ट के आंकड़े खुद बता रहे हैं कि, देश में सघन वन क्षेत्रों की जगह मॉडरेट वन क्षेत्र और मॉडरेट वन क्षेत्र का स्थान ओपन वन क्षेत्र ले रहे हैं। ये एक खतरनाक संकेत है। ओपन वन क्षेत्र में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार 2621 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र में इसने मॉडरेट वन क्षेत्र की जगह ले ली है।

तीसरी बात जिस पर विशेषज्ञ सवाल उठा रहे है वो है ऐसे वन क्षेत्र जहां आग लगने की आशंका ज्यादा है। रिपोर्ट के अनुसार देश के 35 प्रतिशत वन क्षेत्र आग लगने को लेकर संवेदनशील कहे जा सकते हैं और वे जैव विविधता के लिए भी खतरा होते हैं। रिपोर्ट ऐसे क्षेत्रों के बारे में किसी ठोस नीति की तरफ कोई इशारा नहीं करती।    

रिपोर्ट क्यों है महत्वपूर्ण

पर्यावरण, वन एवं क्लाइमेट चेंज मंत्रालय की तरफ से बनाई जाने वाली ये रिपोर्ट 2 वर्षों में एक बार तैयार होती है। 2021 में आई ये रिपोर्ट 17 वीं रिपोर्ट है। ये रिपोर्ट पर्यावरण एवं कृषि संबंधी भविष्य की योजनाओं में महत्वपूर्ण आधार का काम करती है। भारत दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जो इस तरह वन एवं पर्यावरण की दृष्टि से आंकड़ों समेत कोई समग्र रिपोर्ट तैयार करते है।

फोटो सौजन्य – सोशल मीडिया   

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