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अधिकार और आजादी के सवाल पर भारत में आंशिक आजादी : फ्रीडम हाउस

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नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र):

भारत में अधिकारों और आजादी जैसे विषयों को लेकर अमेरिकी शोध संस्थान फ्रीडम हाउस ने गहरी चिंता व्यक्त की है और भारत को आंशिक रूप से स्वतंत्र देशों की श्रेणी में रख दिया है। पूर्ण स्वतंत्र देशों के लिए निर्धारित 100 अंकों में से भारत के अंक घटकर 67 हो गए हैं। पहले ये अंक 71 थे। 211 देशों की इस सूची में अब भारत का स्थान 88 हो गया है पहले ये 83 था। संस्थान की ताजा रिपोर्ट में इसके लिए विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को कठघरे में खड़ा किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही देश में राजनीतिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रता में कमी आई है। संस्था का आंकलन है कि भारत में मानवाधिकार संगठनों पर दबाव बढ़ा है, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों को डराने और उनके खिलाफ मामले दर्ज कर उन पर दबान बनाने का चलन बढ़ा है। रिपोर्ट में ये  कहा गया है कि भारत में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाते हुए कई घटनाएं हुईं हैं। रिपोर्ट पर भारत सरकार ने अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

फ्रीडम हाउस एक अमेरिकी शोध संस्थान है जो हर साल ‘फ्रीडम इन द वर्ल्ड’ रिपोर्ट जारी करता है। इस रिपोर्ट में दुनिया के अलग-अलग देशों में राजनीतिक आजादी और नागरिक अधिकारों के स्तर की समीक्षा की जाती है। ताजा रिपोर्ट में संस्था ने भारत में अधिकारों और आजादी में आई कमी को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की।

अभिव्यक्ति की आजादी पर पहरेदारी

फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट में विशेष रूप से भारत में मोदी सरकार का जिक्र करते हुए कहा गया कि साल 2019 में नरेंद्र मोदी के दोबारा चुने जाने के बाद ऐसी घटनाओँ में विशेष रूप से बढ़ोतरी देखी गई। फ्रीडम हाउस संस्था दुनिया भऱ के देशों को 25 मानकों पर अंक देती है। इनमें आजादी और अधिकारों से जुड़े कई मानक शामिल हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि, हाल के वर्षों में भारत में वैचारिक आजादी और स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर पहरेदारी के तमाम मामले सामने आए हैं। आजाद अभिव्यक्ति के तमाम मामलों में नागरिकों पर राजद्रोह जैसे संगीन अपराध के मामले बना दिए गए।   

निजी संगठनों के काम करने की स्वतंत्रता, विदेश से पैसे लेने के कानून में बदलाव और एमनेस्टी के दफ्तर के भारत में बंद होने होने की वजह से भी भारत के अंकों में कमी हो गई। अदालतों के स्वतंत्र होने के सवाल पर भी भारत के अंक गिरे हैं। इसके पीछे देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्य सभा का सदस्य बनाना, सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार के पक्ष में कई फैसले देने का पैटर्न और सरकार के खिलाफ फैसला देने वाले एक जज के ट्रांसफर जैसी घटनाओं का उल्लेख किया गया है।

अधिनायकवादी प्रवृत्ति चिंताजनक

रिपोर्ट में कोरोना संकट से हुए लॉक़ाउन के दौरान प्रवासियों के आने-जाने में हुई दिक्कतों के सवाल भी उठाए गए और पुलिस प्रशासन के रवैये का भी जिक्र किया गया। रिपोर्ट में ये जिक्र भी किया गया कि कोरोना संकट के दौरान किस तरह से तब्लीगी जमात पर इसे फैलाने का आरोप लगा और इस वर्ग को दोषी ठहराया गया।   इन उदाहरणों को समाने रखखते हुए रिपोर्ट में कहा गया कि, लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रबल समर्थक और चीन जैसे तानाशाह देश के खिलाफ खड़ा होने वाला देश बनाने की जगह मोदी और उनकी पार्टी भारत को तानाशाही की तरफ ले जा रहे हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालात और भी चिंताजनक इसलिए हैं क्योंकि भारत के आंशिक रूप से स्वतंत्र श्रेणी में आने के बाद अब दुनिया की 20 प्रतिशत से भी कम आबादी स्वतंत्र देशों में बची है। ये1995 के बाद से अभी तक का सबसे कम अनुपात है।

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया

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