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एकै साधे सब सधै ! दीदी को मनाने के पीछे कहीं कांग्रेस की यही रणनीति तो नहीं ?

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नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र):: कांग्रेस अपनी रणनीति और संगठन में बड़े फेरबदल की तैय़ारी कर रही है। ये फेरबदल उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड समेत कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव के अलावा राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के सामने एक मजबूत प्रतिपक्ष को तैयार करने के लिहाज से किया जाएगा। अगर सूत्रों की माने तो पार्टी ने अपनी रणनीति के संकेत पिछले कुछ दिनों में जाहिर करने शुरू भी कर दिए हैं। पार्टी के लिए इस दिशा में तेजी से आगे बढ़ने में दिक्कत पंजाब और राजस्थान में पार्टी में मचा घमासान है। पार्टी को उम्मीद है कि जल्द ही पंजाब और राजस्थान में सब कुछ शांत कर लिया जाएगा और पार्टी तेजी के साथ अपनी रणनीति पर आगे काम कर पाएगी।

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने आज एक रिपोर्ट छापी है जिसमें बताया गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी को टक्कर देने के लिए विपक्षी दलों के एक मजबूत गठबंधन की जरूरत को देखते हुए कांग्रेस ने अपने रुख में बदलाव किया है। इस बदलाव का पहला संकेत तृणमूल कांग्रेस के प्रति उसके रुख में नरमी है।

पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के मुखर विरोधी और लोकसभा में कांग्रेस संसदीय़ दल के नेता अधीर रंजन चौधरी से उनका दायित्व वापस लिया जा सकता है। उनके स्थान पर तिरुअनंतपुरम से सांसद और कांग्रेस नेता शशि शरूर या पंजाब से आने वाले मनीष तिवारी को ये जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।       

सूत्रों की माने तो, इस बदलाव के पीछे कांग्रेस की वो रणनीति है जिसके तहत वो तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी से अपनी तल्खी को करना करना चाह रही है। हालांकि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अधीर रंजन चौधरी ने तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ भले जहर उगला हो लेकिन ममता बनर्जी की निजी आलोचना से वे भी बचते रहे। अधीर रंजन को हटा कर कांग्रेस ममता बनर्जी के प्रति अपनी तरफ से अपने रुख में नरमी का संकेत देना चाह रही है। अधीर रंजन चौधरी, कांग्रेस में गांधी परिवार के प्रति निष्छा रखने वाले सांसदों में गिने जाते हैं। उन्होंने कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाने वाले नेताओं की जमकर आलोचन की थी। इसीलिए, उन्हें हटा कर पार्टी ममता बनर्जी को ये जतलाना चाहती है कि वे उनके लिए कितनी खास हैं।    

हालांकि अधीर रंजन चौधरी ने पश्चिम बंगाल चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद ये बयान देकर एक विचित्र स्थिति पैदा कर दी थी कि पार्टी को सोशल मीडिया से बाहर निकल जमीन पर काम करने की जरूरत है।   

दरअसल, कांग्रेस, इस बात को भली भांति समझ रही है कि पार्टी की मौजूदा स्थिति को देखते हुए 2024 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी वोटों के बंटने का सीधा फायदा बीजेपी को होगा और वो ऐसा होने नहीं देना चाहती। इस समय देश के सामने ममता बनर्जी वो चेहरा हैं जिन्होंने मोदी और अमित शाह की चुनौती को न सिर्फ स्वीकारा बल्कि उन्हें तगड़ी पटकनी भी दी। ममता बनर्जी ने भी साफ संकेत दिए हैं कि वे अब बंगाल से आगे राष्ट्रीय स्तर पर राजनीति में सक्रिय होना चाहती हैं। उन्हें एनसीपी, शिवसेना, आरजेडी, समाजवादी पार्टी और आम आदमी पार्टी की तरफ से पहले ही साथ मिलता रहा है। मुश्किल कांग्रेस के साथ है। ममता पहले कांग्रेसी ही थीं और पार्टी छोड़ कर नई पार्टी बनाना और उसे एक ऊंचाई देना उनकी मजबूत और कुशल राजनीतिक समझ का नजीजा है।

कांग्रेस की रणनीति एकै साधे सब सधै वाली सोच की है। उसे लगता है कि अगर ममता बनर्जी को साध लिय़ा तो तमाम विपक्षी दलों को एकजुट करना कहीं आसान होगा और 2024 में बीजेपी के सामने एक मजबूत प्रतिपक्ष मौजूद होगा।

ऐसी भी खबरें हैं कि, तृणमूल कांग्रेस पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनकड़ के खिलाफ संसद के मानसून सत्र में एक जोरदार अभियान चलाने जा रही है। उसकी कोशिश इस अभियान में कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों को साथ लेने की है। ऐसे में ममता बनर्जी की तरफ से भी कांग्रेस की तरफ एक समझौते का हाथ बढ़ सकता है।        

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया

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