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मोदी और योगी राजनीति की दो धाराएं..बीजेपी की मजबूरी या रणनीति?

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नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र) : उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव कुछ महीनों के फासले पर हैं। सभी दल अपनी-अपनी जमीन की तलाश के साथ उस पर खुद को मजबूती से खड़ा करने की कोशिश में जुटे हुए हैं। समाजवादी पार्टी, कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल के अलावा तमाम छोटे और इलाकाई दल चुनावी गुणा-भाग में जुटे हुए हैं।

पिछले चुनाव में जीत हासिल करने वाली बीजेपी भी इस विषय पर मंथन के दौर से गुजर रही है। 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास के नारे के सहारे बीजेपी को प्रचंड बहुमत हासिल हुआ। उत्तर प्रदेश में जनता को नरेंद्र मोदी की बातों पर यकीन बना रहा और बीजेपी को पहले से ज्यादा सीटें हासिल हुईं।

नरेंद्र मोदी ही बीजेपी के लिए वो चेहरा थे जिसे नगर पंचायत से लेकर लोकसभा चुनावों तक में पार्टी ने इस्तेमाल किया और सफलता पाई। मोदी के बढ़ते राजनीतिक ग्राफ के साथ ही बीजेपी का ग्राफ बढ़ा। बीजेपी को सत्ता तक पहुंचाने में मोदी ने बहुत ही सावधानी के साथ समावेशी राजनीति के नारे को अपनाया। सबका साथ, सबका विकास के बाद उन्होंने इसमें सबका विकास भी जोड़ा। ये उसी भरोसे को जीतने की कोशिश थी जिसे बहुत कोशिश के बाद भी बीजेपी आसानी से हासिल नहीं कर पा रही थी। मोदी का ये मंत्र चला और बीजेपी पर समाज के लगभग हर वर्ग ने भरोसा जताया। मोदी लोकसभा में और बीजेपी उत्तर प्रदेश में मजबूत बहुमत के साथ सत्ता में आई।

सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास पर सवाल

कुछ दिनों पूर्व लोकसभा और विधानसभाओँ के लिए हुए उपचुनावों में बीजेपी उस करिश्मे को नहीं दिखा पाई जो अब तक वो दिखाती रही थी। जाहिर है महंगाई, बेरोजगारी, बेहाल अर्थव्यवस्था और प्रशासनिक अक्षमता ने जनता को जज्बाती नारों से निकाल कर हकीकत की दुनिया में ला खड़ा किया।

ऐसा नहीं कहा जा सकता कि नरेंद्र मोदी की साख की कसौटी इन्हीं उपचुनावों के नतीजों को माना जाना चाहिए लेकिन इसने बीजेपी के भीतर कट्टर हिंदुत्व की सोच को हवा जरूर दे दी है। इसकी, दस्तक उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा देखने को मिलेगी। वरिष्ठ पत्रकार सुनयना रमण कहती हैं कि, देश में आज जो हालात हैं उसमें बीजेपी के पास मुद्दों की कमी है। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण, कश्मीर और पाकिस्तान-गद्दारर जैसे मुद्दे अब धीरे- धीरे जनता की निगाह में धार खोते जा रहे हैं। स्थानीय और जमीनी मुद्दे, महंगाई, बेरोजगारी और दूसरे मुद्दे ज्यादा अहमियत पाने लगे हैं। बीजेपी के लिए यही मुश्किल है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की स्थिति को एक डेंट लगा है। विकास के कई पैमानों पर भारत की स्थिति खराब हुई है। बीजेपी के नेता सुब्रमणियम स्वामी, चीन के भारतीय सीमा में कथित अत्तिक्रमण के मसले को उठाकर मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा करते रहे हैं।

सुनयना कहती हैं कि बीजेपी जनता के सवालों पर इस समय डिफेंसिव है। चुनाव सामने हैं और जनता के बीच उसे जाना है। मुद्दे क्या हो, ये उसके लिए एक चुनौती है। वे इस बारे में मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के हालिया ट्वीटों का जिक्र करती है जिसमें उन्होंने कहा था कि, 2017 से पहले राशन सिर्फ अब्बा जान वाले लोगों को मिल रहा था। एक और ट्वीट में वे तालिबान के निपटने की धमकी दे रहे हैं जिसका कोई औचित्य नहीं है।

ऐसा क्यों है। क्या बीजेपी के पास सिर्फ सांप्रदायिक जमीन ही बची है। मोदी समावेश की बात करके भरोसा जीतना चाहते हैं तो योगी सांप्रदायिकता को हवा देकर हिंदू वोटों को पोलराइज़ करने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। ये बीजेपी के लिए दोराहे जैसी बात है।

मद्दे जो अहम होंगे

उत्त्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव 2024 के लिए बीजेपी के साथ ही विपक्ष के लिए भी एक एजेंडा सेट करने का काम करेंगे। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कई जिलों में किसानों के आंदोलन का व्यापक असर पड़ने वाला है। मुजफ्फर नगर में जाट और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक टकराव ने 2017 में बीजेपी को जमकर फायदा पहुंचाया था। इस बार मामला अलग है। किसानों के आंदोलन के चलते जाटों और मुसलमानों के बीच खाई काफी हद तक पट चुकी है। महंगाई और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के अलावा उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़न भी एक बड़ा मसला है। जनता अभी कोरोना के दर्द को भी भूली नहीं है।

सुनयना के अनुसार, बीजेपी लाख कोशिश कर ले लेकिन उसे आने वाले चुनावों को उन मसलों पर लड़ना पड़ेगा जो उसके रोडमैप में फिट नहीं बैठते हैं। ये बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होने वाला है। वे कहती हैं, बीजेपी उस किसान के पास कैसे वोट मांगने जाएगी जिसको वो खालिस्तानी और आतंकवादी बताती रही है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मैदानी इलाकों में ज्यादातर सिख किसान ही तो हैं।

फोटो सौजन्य – सोशल मीडिया

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