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क्या राहुल गांधी के सवालों से सचमुच देश की बेइज्जती होती है ?

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नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र):

काग्रेस नेता राहुल गांधी इन दिनों लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं जिनमें भारतीय लोकतंत्र की मौजूदा स्थिति और बीजेपी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवार उठाए जा रहे हैं। उन्होंने लोकतंत्र, अर्थव्यवस्था, जनता की बदहाली, किसान आंदोलन, मीडिया पर नियंत्रण और चीन की घुसपैठ जैसे मसलों के लेकर लगातार सरकार को घेरा है। उन्होंने इन मसलों पर विदेशी नेताओं, विशेषज्ञों और सोशल एक्टिविस्टों से भी चर्चा की है। राहुल गांधी की ऐसी कोशिशों को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। आरोप लग रहे हैं कि राहुल ऐसा करके देश की छवि को खराब कर रहे हैं और वे देश की साख पर बट्टा लगा रहे हैं।

राहुल अपनी चर्चाओं में आरोप लगाते हैं कि भारत में लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था ध्‍वस्‍त हो गई है। मीडिया पर मोदी सरकार का नियंत्रण है। उनके मुताबिक, 2014 के बाद निष्‍पक्ष लोकतंत्र के लिए जरूरी संस्‍थाओं पर सरकार ने कंट्रोल कर लिया है। राहुल लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि देश में कमजोर नेतृत्व के कारण चीन हमारी जमीन  में घुस आया। उन्‍होंने यहां तक कह डाला कि भारत में होने वाली घटनाओं पर अमेरिकी सरकार की चुप्‍पी उन्‍हें खलती है।

अमेरिका और चीन पर राहुल के बयान

राहुल ने हाल ही में इस तरह के जो बयान दिए उनमें से कुछ का जिक्र करना जरूरी है। अमेरिका के पूर्व राजनयिक निकोलस बर्न्‍स के साथ बातचीत में राहुल गांधी ने कहा कि भारत में आज बीजेपी को छोड़कर कोई भी चुनाव नहीं जीत रहा है। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, बीएसपी, एनसीपी, एसपी कोई भी चुनाव जीतने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि, निष्‍पक्ष लोकतंत्र को चलाने वाली संस्‍थाओं पर कब्‍जा कर लिया गया है। उन्‍होंने आरोप लगाया कि, सरकार को लगता है कि मीडिया पर कंट्रोल कर नरेटिव सेट कर लिया तो बाकी किसी चीज की जरूरत नहीं। राहुल के अनुसार, भारत का नेतृत्व सत्ता के केंद्रीकरण और लोकतंत्र के ढांचे पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण करके सरकार चलाता है।

राहुल ने कहा कि, अमेरिका की सरकार भारत के हालात पर कुछ नहीं बोलती। उन्‍होंने कहा, भारत में क्‍या हो रहा है, मैं इस पर अमेरिकी सरकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं सुनता। मेरा मतलब है कि यहां जो हो रहा है, उस पर उनकी क्‍या राय है। राहुल ने कहा कि, मैं मानता हूं कि अमेरिका के संविधान में स्‍वतंत्रता का जो विचार समाहित है, वो बेहद ताकतवर विचार है लेकिन उसे उस विचार का बचाव करना होगा।

राहुल गांधी ने पिछले एक साल से लगातार चीन के साथ लगती सीमा पर तनाव का मुद्दा  उठाया। उन्‍होंने अपने हालिया बयान में कहा कि, चीन ने भारतीय नेतृत्व की कमजोरी को भांप लिया है। चीन हमारी जमीन पर घुस कर बैठा है। अगर वो ऐसा कर पाया है तो इसके पीछे वजह है वो एक कमजोर भारत और अंदर से विभाजित भारत को देख रहा है।

राहुल के बयानों पर सवाल

बीजेपी और मीडिया में राहुल के इन बयानों को लेकर चर्चाएं काफी गरम है। पूछा जा रहा है कि, राहुल ऐसा करके क्या साबित करना चाहते हैं। क्या वे देश के आंतरिक मामलों में विदेशी दखलंदाजी चाहते हैं या नरेंद्र मोदी पर बाहरी दबाव का हथकंडा अपनाना चाहते हैं।  भारतीय़ मीडिया पर सलाव उठा कर राहुल गांधी ने इस बात का संकेत भी दिया है कि विपक्ष को भारतीय मीडिया से किसी उम्मीद के मुगालते में नहीं रहना चाहिए। एक और सवाल उठाया जा रहा है कि राहुल गांधी ऐसा करके राष्ट्र विरोधी काम कर रहे हैं।

क्या राहुल सचमुच गलत कर रहे हैं

राजनीतिक टिप्पणीकार टी रवि मानते हैं कि, लोकतंत्र की खूबी ही यही है कि वहां वैचारिक अभिव्यक्ति की आजादी होती है। आज जब दुनिया के देश एक दूसरे देशों के बेहद करीब आ रहे हैं, एक दूसरे पर निर्भर हैं तो ऐसे में वे पारदर्शी सामाजिक व्यवस्था भी चाहते हैं। राहुल अगर विशेषज्ञों से चर्चा में या विश्व पटल पर भारत की कमिय़ों को गिनाते हैं तो इसका सिर्फ एक मतलब ये नहीं निकाला जाना चाहिए वे वे भारत को कमजोर करना चाहते हैं। ये एक कट्टर सोच है। हाल के वर्षों में राष्ट्रवाद की जो नई परिभाषाएं सामने आई हैं उनसे दुनिया में अतिवाद बढ़ा है और माहौल ज्यादा खराब हुआ है।

रवि के अनुसार, भारत वैसे ही एक लोकतंत्र है जैसे कि अमेरिका। मिलती जुलती व्यवस्थाओं वाले देशों से राजनीतिक और सामाजिक चिंताओं पर विचार-विमर्श में क्या बुराई है। अगर इसमें बुराई है तो नमस्ते ट्रंप जैसे कार्यक्रमों के औचित्य पर उठे सवाल भी जायज हैं।

रवि मानते हैं कि चीन को लेकर राहुल इस तरह के बयान देने वाले अकेले नेता नहीं है। बीजेपी के खुद के नेता भी सवाल उठाते रहे हैं। सरकार खुद भी स्थिति स्पष्ट नहीं करना चाहती। क्यों नहीं सीमा पर सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजा जाता। भ्रम हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा। सरकार ने तो खुद ही भ्रम की स्थिति बना रखी है। राहुल सत्ता की राजनीति में हैं, कोई भी व्य़क्ति ऐसे हालात का जिक्र कैसे छोड़ सकता है।

रवि, य़हां ये सवाल भी उठाते हैं कि, क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व के विभिन्न देशों में अपने दौरों के समय ये नहीं कहा कि देश में पिछले 70 सालों में कुछ नहीं हुआ। देश को लूटने वाले सत्ता पर काबिज रहे और भारत में लोकतंत्र का मखौल उड़ा। उनका कहना है कि, आज की दुनिया में राजनीतिक बयानों में बेहद आक्रामकता है। राजनीतिक शालीनता और गरिमा खत्म हो रही है। बिना सोचे समझे टिप्पणी करने वालों में बड़े-बड़े नेता भी शामिल हैं। विदेशी धरती से अपने देश के वोटरों को साधने की कोशिश होती है। इससे बचने की जरूरत है।

एक अन्य स्तंभकार वासुदेव के अनुसार, देश में मीडिया पर सवाल उठना लाजमी है। आज देश में सभी मानते हैं कि मीडिया देश के असल मुद्दों पर चर्चा से भागता है। किसानों का मसला, महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे मसले विमर्श से गायब हैं। सरकारें पूरे –पूरे पन्ने के ऐसे विज्ञापन छपवाती हैं जो उनके खुद के आंकड़ों से ही झूठे साबित हो जाते हैं। वासुदेव एक उदाहरण देते हुए बताते हैं कि हाल ही में यूपी सरकार ने चार साल की अपनी उपलब्धियों पर अखबारों में एक फुल पेज के विज्ञापन छपवाया। खुद सरकार के आंकड़ों के हिसाब से ही वो गलत था। किस अखबार या चैनल ने इस पर चर्चा की। ऐसे में मीडिया पर सवाल तो उठेगा ही। 

वासुदेव मानते हैं कि, आज के समय़ में राजनेताओं के बयानों से देशों की छवि नहीं बनती-बिगड़ती। डिजिटल माध्यम से अब सूचनाओं के प्रवाह को रोक पाना नामुमकिन है। हर पक्ष अपनी अपनी बात रखता है। सभ्य या असभ्य जो भी उसका तरीका हो। भारत में मुख्यधारा की मीडिया यानी अखबार और टीवी और डिजिटल माध्यमों से सूचनाओं का प्रवाह दो समानांतर विपरीत धाराओँ का प्रवाह है। आप देखेंगे कि आमतौर पर डिजिटल माध्यमों पर खबरों का वो पक्ष चर्चा में रहता है जो टीवी पर बहस और अखबारों की सुर्खियों में नहीं  रहता।

आभासी माध्यमों की अपनी सीमाएं हैं   

रवि और वासुदेव, दोनों का ही मानना है कि, ट्विटर और फोसबुक जैसे सोशल मीडिया मंचों के प्रभाव की अपनी सीमाएं हैं। इन मंचों पर जो कुछ हो रहा है उससे पाठकों में भ्रम भी फैल रहा है लेकिन उस पर लगाम लगाना नामुमकिन है। सत्ता की राजनीति करने वाले राहुल गांधी जैसे नेता के लिए भी यही बातें लागू होती हैं। भारत जैसे बड़े और विविधताओं से भरे लोकतंत्र को फ्रंट से लीड करने वाले नेताओं की जरूरत है। इसमें कोई दोराय नहीं कि राहुल इस मामले में नरेंद्र मोदी से बहुत पीछे हैं।  

फोटो सौजन्य-सोशल मीडिया         

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