Homeपरिदृश्यटॉप स्टोरीजानिए, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों को दो-टूक नसीहत क्या दी....?

जानिए, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यपालों को दो-टूक नसीहत क्या दी….?

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नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए शोध डेस्क) : करीब तीन दशक पहले उत्तर प्रदेश में तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने एक ऐसी संवैधानिक अराजकता की स्थिति पैदा कर दी कि विधानसभा में दो-दो मुख्य़मंत्री अगल-बगल बैठे नजर आए। हालिया बात करें तो, कुछ दिनों पहले, पश्चिम बंगाल में तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनकड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच विवादों का बने रहना, केरल में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खां और राज्य सरकार के बीच कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर विवाद, तमिलनाडु में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच तल्खी और तेलंगाना में राज्यपाल द्वारा राज्य सरकार से पारित कानूनों को मंजूरी न देना, ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो जाहिर करते हैं कि कई राज्यों में राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है।

दिल्ली मे मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और लेफ्टिनेंट गवर्नर के बीच हमेशा किसी न किसी बात पर विवाद बने रहना और पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार और राज्यपाल के बीच तकरार आम है। आमतौर पर ऐसी स्थिति उन्हीं राज्यों में देखने को मिलती है जिन जगहों पर केंद्र में सत्तारूढ़ दल की सरकारें नहीं होती बल्कि वहां सत्ता में कोई विपक्षी दल होता है।

तेलंगाना में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच विवाद ने इतना जोर पकड़ा कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। राज्य सरकार का आरोप था कि राज्यपाल सरकार द्वारा पारित विधेयकों पर कुंडली मार कर बैठ जाते हैं और अनावश्यक रूप से उनकी मंजूरी में देरी करते हैं। पिछली 24 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने उस विवाद पर अपनी टिप्पणी दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपालों को ये याद रखना चाहिए कि संविधान के अनुच्छेद 200  के तहत राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित विधेयकों पर जल्द से जल्द फैसला करना उनकी जिम्मेदारी है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने कहा कि अनुच्छेद 200 में ‘जितनी जल्दी संभव हो सके’ शब्द महत्वपूर्ण हैं और सभी संवैधानिक अधिकारियों द्वारा इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए।

बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा कि,  ‘अनुच्छेद 200 (1) में उल्लिखित ‘जितनी जल्दी संभव हो सके’ लाइन एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मंशा है और संवैधानिक अधिकारियों द्वारा इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए।’

सुप्रीम कोर्ट की पीठ तेलंगाना सरकार द्वारा दायर एक मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें राज्यपाल तमिलसाई सुंदरराजन को उनके पास लंबित 10 विधेयकों को मंजूरी देने का आदेश देने की मांग की गई थी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि अब राज्यपाल के पास कोई विधेयक लंबित नहीं है लिहाजा अब इस तरह की किसी याचिका का कोई मतलब नही रह जाता। शीर्ष अदालत ने दलील को स्वीकार करते हुए मामले को निस्तारित कर दिया लेकिन उसने अपने टिप्पणी में राज्यपालों को उनके अधिकारों के दायरे के बार में नसीहत भी दे डाली। अदालत ने कहा कि, संविधान में वर्णित प्रावधानों की मूल भावना को समझते हुए जितनी जल्दी संभव हो सके राज्यपाल को लंबित विधायी कार्यों का निस्तारण करना चाहिए।

तेलंगाना सरकार की याचिका में कहा गया था कि संसदीय लोकतंत्र में राज्यपाल के पास आवश्यक स्वीकृति को टालने या देरी करने का कोई विवेक नहीं है। राज्यपाल की ओर से किसी भी देरी सहित कोई भी इनकार संसदीय लोकतंत्र और लोगों की इच्छा को कमजोर करेगा।

हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा ने इस बारे में एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें कहा गया था कि केंद्र सरकार को एक समय सीमा तय करनी चाहिए, जिसके भीतर राज्यपालों को विधेयकों को मंजूरी देनी है। दिल्ली और पंजाब के मुख्यमंत्रियों ने तमिलनाडु विधानसभा के प्रस्ताव के साथ अपनी एकजुटता व्यक्त की।

क्या राज्यपाल केंद्र सरकार के शह पर काम करता है ?

दिल्ली में एलजी और राज्य सरकार के बीच विवाद इतना गहराया कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया। विवाद था, दिल्ली का असली बॉस कौन ? सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की चुनी हुई सरकार को बॉस बताते हुए एलजी को अपने दायित्वों के पालन का निर्देश दिया। इसके बावजूद दिल्ली सरकार और एलजी के बीच कोई न कोई विवाद चलता रहता है।

केरल में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खां ने राज्य के विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर अच्छा खासा विवाद खड़ा कर दिया। हाईकोर्ट की दखल के बाद जाकर मामला शांत हुआ। इसी तरह से पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार विधानसभा का सत्र बुलाना चाहती थी लेकिन राज्यपाल उसे लगातार टाल रहे थे। काफी रस्साकसी के बाद जाकर सत्र आहूत हो पाया।

सविधान विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता रंजन कुमार के अनुसार, ‘ये सही है कि, भारत में राज्यपालों के पद का दुरुपयोग केंद्र सरकारे करती रही हैं। राज्य़ में अगर किसी दूसरे दल की सरकार है तो केंद्र के प्रतिनिधि के तौर पर राज्यपाल कुछ न कुछ अड़ंगा डालने का काम करते रहे हैं। बहुत से उदाहरण हैं। कांग्रेस के समय भी ऐसा होता था। हां, इस समय थोड़ा ज्यादा है। ये संविधान की मूल संघीय भावना के खिलाफ है। राज्यपालों को संविधान और अपनी शक्तियों  के दायरे के भीतर काम करना होता है अगर वे अपनी सीमा लाघेंगे तो दिक्कत होगी।’

फोटो सौजन्य – सोशल मीडिया    

 

 

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