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अरे, नेता जी लोगों, अपनी नहीं, तो कुर्सी की मर्यादा का ही ध्यान रख लो !

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लखनऊ ( गणतंत्र भारत के लिए हरीश मिश्र ) : संसद का बजट सत्र। लोकसभा हो या राज्यसभा चर्चा बजट प्रस्तावों पर होनी थी लेकिन वो हो किस पर रही है ? राहुल गांधी आइडिया ऑफ इंडिया समझा रहे हैं तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राजनीति में परिवारवाद के खतरे के बारे में बता रहे हैं। एक-दूसरे पर हमले करने में कोई पीछे नहीं। जब राहुल गांधी लोकसभा में बोले तो प्रधानमंत्री सदन में नहीं थे, जब प्रधानमंत्री का भाषण हुआ तो राहुल गांधी गायब। शब्द, भाव और बॉडी लैंग्वेज सभी हमले का जरिया बने हुए थे। प्रधानमंत्री ने मोर्चा खोला तो बीच में अरविंद केजरीवाल भी आ गए। कोरोना काल में दिल्ली सरकार ने उत्तर प्रदेश और बिहार के श्रमिकों को उनके घर वापस भेजने के लिए जो कदम उठाए प्रधानमंत्री ने उसे कोरोना बांटने का जरिया बता दिया।

अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री के बयान को कोरा झूठ बताया। बस फिर क्या था कूद पड़े उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ। ट्विटर पर जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल हुआ वो वास्तव में शर्मनाक है। दो- दो मुख्यमंत्री संवाद का तरीका देखिए, सुनो केजरीवाल, सुनो योगी आदित्य नाथ। चुनावी माहौल में गर्मागर्मी कोई नई बात नहीं है लेकिन जिस तरह की शब्दावली अब राजनीति की शैली बन गई है उसे किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता।

विधानसभा चुनाव तो पांच राज्यों में हो रहे हैं लेकिन उत्तर प्रदेश में लड़ाई कुछ ज्यादा तल्ख है। राजनीतिक गर्मागर्मी तो है ही लेकिन जिस तरह की भाषा इन चुनावों में आजमाई जा रही है वो भारतीय लोकतंत्र के स्वस्थ भविष्य पर प्रश्नचिन्ह जरूर लगाती है।

मामले की पड़ताल में थोड़ा पीछे लौटिए तो पाएंगे कि, ज्यादातर मामलों में इस तरह की ऊंटपटांग बातों और घटिय़ा शब्दों का इस्तेमाल पहले योगी आदित्यनाथ और बीजेपी के दूसरे नेताओं की तरफ से हुआ है। शमशान-कब्रिस्तान, अब्बाजान, गर्मी निकालने की धमकी और न जाने क्य़ा-क्या। लंबी फेहरिस्त है। योगी के बोल बिगड़े को जवाब मिलना ही था। गर्मी का जवाब चर्बी से मिलने लगा। और फिर, बात लखनऊ से निकल कर दिल्ली पहुंच गई। शुरू हो गया, दो मुख्यमंत्रियों के बीच बिगड़े बोल का संवाद और वो भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर।

राजनीति और शब्द मर्यादा

भारत की संसदीय राजनीति और परंपराओं में तीखी से तीखी बात मर्यादित शब्दों में कहने की एक स्वस्थ परंपरा रही है। संसद में समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को उनकी नीतियों को लेकर अकसर घेरते थे लेकिन उनके भाषणों में कभी शब्दों की मर्यादा का उल्लंघन हुआ हो ऐसा नहीं था। आपातकाल के दौर में जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गांधी के बीच जबरदस्त संघर्ष चला लेकिन भाषा हमेशा संयत रही। अटल बिहारी वाजपेयी ने जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी और सदी के बदलने तक की राजनीतिक परंपराओं को देखा और बरता लेकिन भाषा हमेशा ऐसी रही कि उसकी दाद दी जाती रही।

समाजविज्ञानी प्रोफेसर पी. कुमार के अनुसार, भारतीय लोकतंत्र में भाषायी मर्यादा की सीमाएं लांघने का दौर खासतौर पर आक्रामक राजनीति के दौर के साथ शुरू हुआ। मंदिर आंदोलन के दौर को प्रायोगिक अवस्था कहा जा सकता है। 2012-13 के बाद भारतीय राजनीति की भाषा बेहद आक्रामक हो गई। 2019 के लोकसभा चुनावों में मुद्दों की जगह जज्बात ने ले ली और तर्क की जगह अनर्गल दलीलों ने। प्रो. कुमार मानते हैं राजनीति में वैचारिक कट्टरता ने भाषा के संयम को भी अपना शिकार बना लिया। एक खास विचारधारा के परिपोषकों को लगने लगा कि वे कुछ भी बक दें उनके खिलाफ कुछ नहीं होगा। राष्ट्रवाद के मुल्लम्में में असभ्य और गालीगलौच की भाषा ने जगह बना ली। ये गलत है। ये प्रयोग सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहने वाला। समय के साथ ये और विद्रूप होता जाएगा।

प्रोफेसर कुमार कहते हैं कि, देख लीजिए दो मुख्यमंत्री किस तरह की फुटपाथिया भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। राजनीति में चिलम, टोंटी, पप्पू, मोटा भाई, खोटा भाई, चोर, तड़ीपार जैसे शब्दों  की परंपरा कब शुरू हुई ? सोशल मीडिया ने लोगों को अभिव्यक्ति का अवसर तो दिया लेकिन साथ ही साथ एक एजेंडा को साधने का टूल भी दिया। उसके नतीजे आज सबके सामने हैं।

क्या होना चाहिए       

सवाल ये उठता है कि होना क्या चाहिए जिससे हालात में सुधार हो। गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय नोएडा मे क्लीनीकल साइकोल़ॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर शिवानी पांडे का कहना है कि, भाषायी मर्यादा का खत्म होना हताश मानसिकता की देन है। आक्रामकता चाहे जीवन में हो या राजनीति में आमतौर पर खोखली बुनियाद की पहचान होती है। जोर से बोल कर, डपट कर, झुंड बना कर शब्दों से घेरना भले ही कहने में रणनीति हो लेकिन हरकत ये एक पराजित मानसिकता की ही निशानी होती है।

फोफेसर पी. कुमार मानते हैं कि ऐसी शब्दावली उसी दिन खत्म हो जाएगी जिस दिन विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता अपनी मर्यादाओं को तय कर लेंगे और चुनाव आयोग जैसी संस्थाएं सिर्फ कागजी नहीं बल्कि चुनावी नियमों और आचार पर निष्पक्ष तरीके से निगाह रखना शुरू कर देंगी।  

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया

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