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यूपी-बिहार के ‘भइए’ दूसरे राज्यों के चुनावों में क्यों बन जाते हैं ‘पंचिंग बैग’ ?

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नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए लेखराज) : उत्तर प्रदेश और बिहार के ‘भइया’ पंजाब के चुनावों में मुद्दा बन गए हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने एक चुनावी सभा में कहा कि, सारे पंजाबी एक हो जाओ, यूपी, बिहार और दिल्ली के भइया जो पंजाब में राज करना चाहते हैं, हम उन्हें घुसने नहीं देंगे।

जब चन्नी ऐसा कह रहे थे तो उनके साथ मंच पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी मौजूद थीं। चन्नी ने उन्हें पंजाब की बहू बताया। प्रियंका ने भी चन्नी के इस बयान पर तालियां ठोंकी।

पंजाब में चुनाव 20 फऱवरी को है। चुनावी माहौल है तो मामला गरमाना ही था। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस जुबानी जंग में कूद पड़े। उन्होंने प्रतिक्रया में एक ट्वीट किया और कहा कि, पंजाब में बिहार के लोगों की कितनी बड़ी भूमिका है, बिहार के लोगों ने कितनी सेवा की है। हमें तो आश्चर्य लगता है कि ऐसी बात लोग कैसे बोल देते हैं। ट्विटर पर नीतीश कुमार के बयान के बाद चन्नी और प्रियंका गांधी पर निशाना साधते हुए सोशल मीडिया पर बहस ही छिड़ गई।

पंजाब के चुनाव के अलावा अभी उत्तर प्रदेश में भी 5 चरण के चुनाव बाकी हैं। बीजेपी इस बयान की आड़ में पंजाब के अलावा उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को निशाने पर लेने का प्रयास कर रही है।

यूपी-बिहार का प्रवासी मजदूर और पंजाब

पंजाब में करीब 80 लाख प्रवासी मजदूर हैं और इनमें से 30 लाख से ज्यादा अकेले बिहार के हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश को भी इसमें जोड़ दें तो ये संख्या 50 लाख पार कर जाती हैं। इन मजदूरों की सबसे ज्यादा संख्या पंजाब के औद्योगिक शहरों, लुधियाना, जालंधर और अमृतसर में है। इसके अलावा बड़ी अनान मंडियो वाले शहरों में भी ये काफी बड़ी तादाद में मजदूरी करते मिल जाएंगे। इसमें से बहुत से प्रवासी अब पंजाब में ही रच बस गए हैं और वे परिवार सहित पंजाब में निवास कर रहे हैं। उनके वोटर कार्ड और आधार पर पंजाब का पता मिल जाएगा। यूपी-बिहार के इन भइयों की सबसे बड़ी संख्या वैसे मुंबई में है लेकिन ये देश के विभिन्न हिस्सों में काम की तलाश में जाते रहते हैं।

चुनाव में भइय़े क्यों बनते हैं मुद्दा ?

पंजाब हो या देश का कोई भी दूसरा राज्य, इन प्रवासी मजदूरों के वजह से स्थानीय लोगों के रोजगार के अवसरों पर असर पड़ता है। कम पैसों में बिना किसी झंझट-झगड़े के काम काम करने वाले ये लोग भी अपने घरों से दूर कैसी भी शर्तों पर आसानी से काम के लिए तैयार हो जाते हैं। मालिक को इन्हें कम पैसा देना होता है, वो ज्यादा घंटों तक काम करते हैं और लोकल आदमी न होने की वजह से विवाद की स्थिति में उनसे आसानी से निपटा जा सकता है। मालिक को उनमें जिम्मेदारी कम मुनाफा ज्यादा नजर आता है। स्थानीय लोग मानते हैं वे उनके काम-धंधे को उनसे छीनते हैं और यहीं से दूरियां पैदा होती हैं।

चुनावों में अकसर स्थानीय बनाम बाहरी एक मुद्दा होता है और जो आपके पेट पर लात मारता हो तो मामला थोड़ा ज्यादा संगीन हो जाता है। मुनाफा कमाने के लिए पंजाब में इन प्रवासियों की भारी मांग होती है लेकिन जब चुनाव आते हैं तो इन्हीं प्रवासी मजदूरों को सामने रख कर स्थानीय लोगों को समझाया जाता है कि ये तुम्हारा रोजगार, काम-धंधा छीन रहे हैं। हमें वोट दो, हम इन्हें बाहर करेंगे। चन्नी का ये बयान भी उसी क्रम की एक कड़ी है। अकेले चन्नी नहीं, अकाली दल और राज्य के दूसरे राजनीतिक दल भी इन मुद्दों को भुनाते रहे हैं।

सोशल मीडिया पर जोरदार बहस

प्रवासी मजदूरों का मामला सोशल मीडिया पर तीखा लेकिन दिलचस्प मोड़ लेता जा रहा है। ट्विटर के एक यूजर ने लिखा है कि, बिहार और यूपी की सरकारों के लिए, चाहे वे पहले की हों या अभी की डूब मरने वाली बात है। देश में कहीं भी हो गाली वहीं के लोगों को पड़ती है।   क्यों नहीं अपने लोगों को रोजगार देते हो।

एक दूसरे यूजर लिखते हैं कि, नीतीश कुमार बहुत नाराज हैं लेकिन नीतीश जी बिहार में उद्योग धंधे खोलिए। अपने लोगों से दूसरों की सेवा मत करवाइए, अपने राज्य की सेवा करवाइए, खुशहाल होगा। बिहारी भी कहीं जाएगा तो अपमान नहीं सम्मान पाएगा।

ट्विटर पर यूजर योगराज लिखते हैं कि, देश में कोई कही भी आ-जा सकता है, काम कर सकता है। भइए भी अपने ही हैं। आखिर हम पंजाबी भी तो दुनिया के दूसरे देशों में पैसा कमाने जाते हैं। हम तो इंटरनेशनल बिहारी हैं।

प्रवासी और स्थानीय संस्कृति

पंजाब में लुधियाना में एक उद्यम के फैडरेशन के चेयरमैन टी.आर मिश्रा का कहना है उनके उद्यम में करीब 40 हजार प्रवासी काम करते हैं और इनमें से अधिकतर बिहार के हैं। वहां की संस्कृति, तीज त्यौहार सभी स्थानीय स्तर पर भी मनाए जाते हैं। वरिष्ठ पत्रकार राजेंदर बरार का कहना है कि, प्रवासियों ने स्थानीय संस्कृति पर काफी असर डाला है। वे बताते हैं कि, आज अधिकतर पंजाबियों के बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढते हैं। वे पंजाबी बोल भले लें लेकिन गुरुमुखी लिखना उनमें से अधिकतर को नहीं आता जबकि सरकारी स्कूलों में पंजाबी 10वीं तक अनिवार्य है और इन प्रवासियों के बच्चे वहां पढ़ते हैं। उन्हें पंजाबी बोलना और लिखना अच्छे से आता है। बरार का कहना है कि, प्रवासी मजदूर पंजाब की जरूरत हैं। स्थानीय पंजाबी बहुत भारी तादाद में कनाडा, ऑस्ट्रेलिय़ा और य़ूरोप के देशों में चले जाते हैं और वही बस जाते हैं। यहां खेतों से लेकर घरों में बुजुर्गों की देखरेख सब काम अधिकतर प्रवासी कामकाजी ही संभालते हैं।

बरार कहते है कि, कोई भी व्यक्ति अपना घरबार आसानी से नहीं छोड़ना चाहता। सवाल पेट का होता है। लेकिन किसी राज्य की पहचान ही प्रवासी मजदूर बन जाएं ये ठीक नहीं। ये शर्मिंदगी की बात है। वहां के राजनेताओं के लिए ये शर्म की बात है। कुर्सी पर बैठ कर उन्होंने क्या किया ये सोचने की बात है।

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया   

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