जयपुर (गणतंत्र भारत के लिए कैलाश शर्मा ) : राजस्थान क्रिकेट संघ चुनाव परिणाम सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार मुल्तवी कर दिए गए हैं। यह ऐसा सच था, जिसका अंदेशा इंगित हो गया था। दो आधार इसके पीछे बताये गये, पहला राजस्थान क्रिकेट संघ चुनाव में किसी महिला का मतदाता नहीं होना और दूसरे नवगठित तीन जिला संघों को राजस्थान क्रिकेट संघ से संबद्ध कर दिया जाना। इन दोनों मामलों में अदालत का अंतिम निर्णय प्रतीक्षित रहेगा, तब तक राजस्थान क्रिकेट संघ कौन चलायेगा यह सवाल अब सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इसलिए कि 2024 के प्रथम तिमाही में आरसीए के तत्कालीन अध्यक्ष वैभव गहलोत के इस्तीफे के बाद श्रीगंगानगर के विधायक जयदीप बिहाणी की अध्यक्षता में एडहॉक कमेटी बनी थी, जो बहुत बार रिपीट हुई। इस कमेटी के जिम्मे था संघ के चुनाव करवाना, नतीजा क्या रहा सामने है। इसके बाद आई डी डी कुमावत की अध्यक्षता वाली एडहॉक कमेटी, यह भी चुनाव की जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाई और रुखसत हो गई। फिर राजस्थान सरकार ने एक प्रशासनिक अधिकारी के जिम्मे यह काम किया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट आदेश के कारण उसका जिम्मा भी निर्णायक मुकाम तक नहीं पहुंच पाया।
जिसका दबदबा उसकी दखल
बहरहाल महत्वपूर्ण बात यह है कि राजस्थान क्रिकेट संघ में फेयर काम आज तक नहीं हो पाया है। पूरी तरह अनफेयर एक्टिविटीज इसकी बुनियाद रही है। इसके पीछे वजह रही, जिसका दबदबा उसका दखल, जिसकी चलत उसका राज। यूं राजस्थान में 41 राजस्व जिले हैं, लेकिन आरसीए की मतदाता सूची में नाम केवल 34 जिलों के सचिवों के हैं, इनमें भी तीन नये जिलों डीडवाना, बालोतरा व खैरथल में जिला क्रिकेट संघ के मनोनयन को अदालत में चुनौती दी गई है। दो जिलों जयपुर व नागौर में एडहॉक कमेटी अध्यक्ष मात्र हैं, तीन जिलों हनुमानगढ़, बीकानेर व बाड़मेर में अध्यक्ष ही नहीं है और ब्यावर, केकड़ी, कोटपूतली, फलौदी व डीग में जिला क्रिकेट संघ बने ही नहीं है। अतः राजस्थान क्रिकेट संघ के लिए आधारभूत ढांचा अर्थात संगठन का निचला स्तर अभी अधूरा ही है। भारतीय प्रशासनिक सेवा के जिन सेवा निवृत्त अधिकारियों को जिला क्रिकेट संघों के पदाधिकारियों की सूची तैयार करने का जिम्मा राजस्थान सरकार ने सौंपा था, वह काम ईमानदारी व नियमानुसार किया गया है या नहीं यह भी समीक्षा व जांच का विषय है, राजस्थान सरकार को यह मामला गंभीरता से देखने व समझने की जरूरत है। क्योंकि यह काम अगर सच्चाई व परफेक्शन के साथ होता तो आज अदालती आदेश के कारण चुनाव परिणाम टालने की नौबत नहीं आती। समानांतर बात यह कि जो सूची निर्वाचन अधिकारी के तौर पर जारी की गई वह अधूरी थी। सभी 41 जिलों का प्रतिनिधित्व नहीं था और जो था वह चयन कमोबेश फेयर नहीं था।
कायदे से राजस्थान क्रिकेट संघ के निर्वाचन अधिकारी के पास प्रदेश के सभी क्रिकेट क्लबों की जानकारी होनी चाहिए थी कि किस जिले में कितने क्रिकेट क्लब है। इन क्लबों में कितने जिला क्रिकेट संघ से संबद्ध हैं, जो अच्छे व पुराने क्लब हैं वे संबद्ध हैं तो ठीक नहीं है तो क्या वजह है। जैसे कि झालावाड़ जिला मुख्यालय का सबसे प्राचीन क्रिकेट क्लब जिला क्रिकेट संघ से संबद्ध ही नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। फिर क्लब सहकारिता विभाग से पंजीकृत हैं तो उनकी वार्षिक आडिट रिपोर्ट भी निर्वाचन अधिकारी के पास होनी चाहिए, ताकि क्लब की वैधता वे सुनिश्चित कर सकें। इसके बाद बारी आती है जिला क्रिकेट संघ चुनाव की, यह सबसे पेचीदा मामला है। दौसा जिले को लीजिए, एक निर्वाचित टीम है जिसका कार्यकाल अगले साल तक है और एक टीम जिला खेल अधिकारी द्वारा मान्यता प्राप्त है, अब उसे वैधानिक बना रखा है। इस तरह के झंझट पूरे राज्य में अधिकतर जगह है। आरसीए के निर्वाचन अधिकारी अगर जिला क्रिकेट संघों के फेयर चुनाव करवा लेते तो बेहतर रहता। बहरहाल आरसीए चुनावी मोड में गुल्ला माटी खा रही है और क्रिकेट का कोई धणी धोरी नहीं है।
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