Homeखुला मंचक्या वेटिंग में हैं नेपाल जैसी और तबाहियां......!

क्या वेटिंग में हैं नेपाल जैसी और तबाहियां……!

spot_img

नई दिल्ली (गणंतत्र भारत के लिए सुरेश उपाध्याय) : पिछले साल उत्तराखंड के धराली में अचानक आई बाढ़ से भारी तबाही हुई थी। इस घटना में कितने लोग मारे गए और कितने लापता हो गए, इस बाबत कोई सटीक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। इस साल नेपाल में अचानक आई इससे भी खतरनाक बाढ़ में बड़ी संख्या में लोग मारे गए हैं और सैकड़ों लापता हैं। इन दोनों ही घटनाओं की वजह ग्लेशियरों के पानी से बनी झीलों का फटना बताया जा रहा है। नेपाल के लिए तिब्बत क्षेत्र में बनी एक और बड़ी ग्लेशियल लेक बहुत बड़े खतरे की ओर इशारा कर रही है। इस झील में 500 करोड़ लीटर पानी बताया जा रहा है। अभी जिस झील के फटने से तबाही हुई है, उसमें करीब 350 करोड़ लीटर पानी था। कुल मिलाकर बड़ा खतरा बना हुआ है। फ्लैश फ्लड का यह खतरा देश के हिमालयी राज्यों में भी बना हुआ है।

लगातार चेता रहे हैं पर्यावरणविद्

पर्यावरणविद एक लंबे समय से ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के मुद्दे पर दुनिया को आगाह कर रहे हैं, लेकिन उनकी चेतावनी का कोई असर नहीं हो रहा है। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों के पिघलने से सैकड़ों झीलें बन गई हैं। इनमें से कई बड़ी झीलें हैं, जो अगर फट गईं तो भारत और हिमालयी क्षेत्र के देशों में भारी तबाही मच सकती है।

हालात हैं खतरनाक

कुछ अर्सा पहले इसरो की एक स्टडी से पता चला था कि देश में गढ़वाल की भिलंगना घाटी के ग्लेशियर लगातार सिकुड़ रहे हैं। स्टडी के मुताबिक, 1965 के बाद से इस इलाके के ग्लेशियरों के आकार में करीब 4350 मीटर तक की कमी आई है। इसरो का कहना है कि क्लाइमेट चेंज के कारण ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। स्टडी के मुताबिक, इन ग्लेशियरोों की सबसे पहले 1965 में अमेरिका के कोरोना सैटलाइट से इमेज ली गई। इन इमेज्स की तुलना 2014 में इसरो के कार्टोसेट और और पिछले साल रिसोर्ससैट से ली गई तस्वीरों से तुलना की गई। पाया गया कि इनके साइज में तब से काफी कमी आई है। स्टडी के मुताबिक, यह हालत चिंताजनक है।

अकेले गढ़वाल क्षेत्र में 9575 ग्लेशियर

गढ़वाल के हिमालयी इलाके में 9575 ग्लेशियर हैं। भिलंगना घाटी पश्चिम और उत्तर में भागीरथी समूह के ग्लेशियरों से तो पूर्व में मंदाकिनी समूह के ग्लेशियरों से घिरी हुई है। घाटी क्षेत्र में 33 ग्लेशियर हैं और भिलंगना नदी यहीं से निकलती है। इस क्षेत्र में खटीलांग सबसे बड़ा ग्लेशियर है। इसरो का कहना है कि इस क्षेत्र के सभी ग्लेशियरों की हालत कमोबेश एक जैसी है और इनकी बर्फ तेजी से पिघल रही है। सिक्किम, लद्दाख, तिब्बत और दुनिया के तमाम इलाकों के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र ने भी चेताया था

गौरतलब है कि कुछ साल पहले संयुक्त राष्ट्र की एक कमिटी ने भी कहा था कि हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और कुछ साल में इनके गायब होने की आशंका है। टेरी के तत्कालीन महानिदेशक आर. के. पचौरी की अगुवाई वाली इस कमिटी की रिपोर्ट पर तब काफी हंगामा हुआ था। इसके बाद कई स्ट्डीज में हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों का साइज बढ़ने की बात भी कही गई। बहरहाल, पर्यावरणविदों का कहना है कि अगर बढ़ते तापमान और इसके कारण हो रहे जलवायु परिवर्तन पर लगाम नहीं लगाई गई तो ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना जारी रहेगा और बाढ़,  बारिश के कारण दुनिया में और ज्यादा तबाही होगी।

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -spot_img

Most Popular

- Advertisment -spot_img

Recent Comments