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क्यों जरूरी है, स्वास्थ्य़ नीति को पर्यावरण के साथ जोड़ना…?

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नई दिल्ली (गणतंत्र भारत के लिए सुरेश उपाध्याय) : बड़े-बुजुर्ग कह गए हैं कि जितना प्रकृति के साथ चलोगे उतने सेहतमंद रहोगे। पक्षियों और जानवरों से सीखो। भोर होते ही पक्षी दाना-पानी के लिए अपने घोसलों से बाहर चले जाते हैं और शाम ढलते ही वापस अपने आशियाने पर लौट आते हैं। इसका मतलब क्या हुआ? सुबह जल्दी जागो, रात को जल्दी सो। खाना ताजा, फल- सब्जी और दूध। लेकिन क्या ऐसा हो पाता है ? शायद नहीं। नई पीढ़ी तो क्लॉक नहीं एंटी क्लॉक वाइज़ चलती है। नतीजा, प्रकृति के खिलाफ जाने पर सेहत खराब होती है।

मनुष्य का जीवन प्रकृति से शुरू होता है और अंततः उसी में विलीन हो जाता है। जन्म से लेकर जीवन के अंतिम क्षण तक हमारा शरीर, हमारी सांसें, हमारा भोजन, हमारा मानसिक संतुलन और हमारी जीवन-शैली प्रकृति से गहराई से जुड़ी रहती है। फिर भी आधुनिक जीवन की भागदौड़ में इंसान ने स्वास्थ्य के प्रश्न को प्रकृति से अलग करके देखना शुरू कर दिया है। आज बीमारी को केवल दवाइयों, अस्पतालों और जांचों तक सीमित कर दिया गया है, जबकि स्वास्थ्य का वास्तविक आधार प्रकृति के साथ संतुलित संबंध में छिपा है।

आज जब दुनिया जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों जैसे, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, अवसाद, मोटापा और हृदय रोग से जूझ रही है, तब यह समझना जरूरी हो गया है कि स्वास्थ्य का प्रश्न केवल शरीर का नहीं बल्कि मन, समाज और पर्यावरण का भी है। यदि हवा दूषित है, पानी प्रदूषित है, भोजन रासायनिक है और जीवन कृत्रिम है, तो केवल चिकित्सा विज्ञान स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर सकता। इसलिए सेहत के सवाल को प्रकृति के साथ जोड़कर देखना समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

प्रकृति : स्वास्थ्य की पहली पाठशाला

प्रकृति मनुष्य की पहली चिकित्सक रही है। प्राचीन सभ्यताओं में स्वास्थ्य का अर्थ केवल रोग का अभाव नहीं था, बल्कि प्रकृति के साथ सामंजस्य माना जाता था। आयुर्वेद में भी कहा गया है कि शरीर पंचमहाभूतों, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से बना है। इन तत्वों में असंतुलन होने पर बीमारी जन्म लेती है।

जब कोई व्यक्ति सुबह की ताजी हवा में गहरी सांस लेता है, नदी के किनारे चलता है, पेड़ों की छांव में बैठता है या मिट्टी से जुड़ता है, तो उसके शरीर और मन दोनों को लाभ मिलता है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि प्राकृतिक वातावरण में रहने से तनाव हार्मोन कम होता है, रक्तचाप नियंत्रित होता है और प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है।

आज शहरी जीवन में रहने वाला व्यक्ति सीमेंट की दीवारों, बंद कमरों और कृत्रिम रोशनी में अधिक समय बिताता है। इसका सीधा असर उसकी शारीरिक और मानसिक सेहत पर पड़ता है। इसलिए स्वास्थ्य की चर्चा करते समय प्रकृति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

शुद्ध हवा : जीवन का अदृश्य आधार

मनुष्य भोजन के बिना कई दिन रह सकता है, पानी के बिना कुछ दिन, लेकिन हवा के बिना कुछ मिनट भी नहीं। फिर भी आधुनिक समाज ने सबसे ज्यादा उपेक्षा हवा की ही की है। शहरों में बढ़ते प्रदूषण ने स्वास्थ्य को गंभीर संकट में डाल दिया है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रदूषित हवा फेफड़ों की बीमारी, हृदय रोग, स्ट्रोक और कैंसर तक का कारण बन सकती है। बच्चों में अस्थमा और बुजुर्गों में सांस संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं।

प्रकृति हमें स्वच्छ हवा देती है। पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके ऑक्सीजन देते हैं। जंगल पृथ्वी के फेफड़े हैं। यदि शहरों में हरियाली कम होगी तो स्वास्थ्य भी कमजोर होगा। इसलिए सेहत का सवाल केवल अस्पताल बढ़ाने का नहीं बल्कि पेड़ बचाने और हरियाली बढ़ाने का भी है।

जब किसी शहर में पार्क, खुला स्थान और पेड़-पौधे अधिक होते हैं, वहां रहने वाले लोगों का मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर पाया गया है। प्रकृति के बीच कुछ समय बिताना दवा से कम असरदार नहीं होता।

पानी : शरीर और प्रकृति का साझा तत्व

मानव शरीर का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा पानी है। पानी केवल प्यास बुझाने का साधन नहीं, बल्कि शरीर की हर कोशिका के लिए आवश्यक है। यदि पानी शुद्ध न हो तो स्वास्थ्य की नींव कमजोर हो जाती है।

आज कई क्षेत्रों में जलस्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। नदियों में औद्योगिक कचरा, कीटनाशक और प्लास्टिक मिल रहे हैं। इससे जलजनित रोग बढ़ रहे हैं, जैसे, डायरिया, टाइफाइड, हैजा और त्वचा रोग।

प्रकृति का संतुलन बिगड़ने से जल संकट भी बढ़ा है। वर्षा चक्र प्रभावित हुआ है, भूजल कम हो रहा है। इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है।

पानी और स्वास्थ्य का रिश्ता हमें यह सिखाता है कि पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति प्रेम नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का विषय है। यदि जलस्रोत सुरक्षित रहेंगे तो समाज स्वस्थ रहेगा।

भोजन और मिट्टी का स्वास्थ्य

हमारा भोजन सीधे मिट्टी से आता है। यदि मिट्टी स्वस्थ है तो भोजन पौष्टिक होगा, और यदि मिट्टी बीमार है तो भोजन भी कमजोर होगा। आधुनिक कृषि में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के अत्यधिक उपयोग ने मिट्टी की उर्वरता घटा दी है।

आज फल और सब्जियां पहले जितनी पोषक नहीं रहीं। भोजन में रसायनों की मात्रा बढ़ने से हार्मोन असंतुलन, कैंसर और पाचन संबंधी रोग बढ़ रहे हैं।

जैविक खेती, स्थानीय खाद्य पदार्थ और मौसमी फल प्रकृति आधारित स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पहले लोग मौसम के अनुसार भोजन करते थे। गर्मियों में हल्का, बरसात में पाचनकारी और सर्दियों में ऊर्जावान भोजन लिया जाता था। यही प्रकृति के साथ तालमेल था।

आज प्रोसेस्ड फूड और पैकेज्ड भोजन ने प्राकृतिक आहार की जगह ले ली है। इसका परिणाम मोटापा और जीवनशैली रोगों के रूप में सामने आ रहा है। इसलिए स्वास्थ्य को समझने के लिए मिट्टी और भोजन के संबंध को समझना जरूरी है।

सूरज की रोशनी और मानसिक स्वास्थ्य

प्राकृतिक प्रकाश मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। सूर्य की रोशनी से शरीर में विटामिन D बनता है, जो हड्डियों, प्रतिरक्षा तंत्र और मानसिक संतुलन के लिए जरूरी है।

आज लोग बंद कमरों में अधिक समय बिताते हैं। बच्चे मोबाइल और स्क्रीन के बीच रहते हैं। इससे विटामिन D की कमी तेजी से बढ़ रही है। साथ ही अवसाद और चिंता जैसी मानसिक समस्याएं भी बढ़ रही हैं।

शोध बताते हैं कि प्राकृतिक प्रकाश में समय बिताने से मन प्रसन्न रहता है और नींद बेहतर होती है। प्रकृति के बीच चलना, बागवानी करना और खुली धूप लेना मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है।

यह स्पष्ट करता है कि स्वास्थ्य केवल दवाइयों का विषय नहीं, बल्कि जीवनशैली और प्रकृति से जुड़ाव का भी विषय है।

प्रकृति से दूरी और रोग

आधुनिक जीवन ने इंसान को सुविधाएं दी हैं, लेकिन प्रकृति से दूर भी कर दिया है। वातानुकूलित कमरे, कृत्रिम भोजन, तनावपूर्ण दिनचर्या और डिजिटल जीवन ने शरीर की प्राकृतिक लय को बिगाड़ दिया है।

कुछ प्रमुख समस्याएं जो प्रकृति से दूरी के कारण बढ़ी हैं—

  • मोटापा
  • मधुमेह
  • उच्च रक्तचाप
  • अनिद्रा
  • अवसाद
  • एलर्जी
  • कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली

पहले लोग अधिक चलते थे, खेतों में काम करते थे, मिट्टी और धूप के संपर्क में रहते थे। आज शरीर निष्क्रिय है और मन तनावग्रस्त। यही आधुनिक स्वास्थ्य संकट की जड़ है।

बच्चों की सेहत और प्रकृति

बच्चों का स्वास्थ्य प्रकृति से विशेष रूप से जुड़ा है। जो बच्चे खुले मैदान में खेलते हैं, मिट्टी से जुड़ते हैं और पेड़ों के बीच समय बिताते हैं, वे शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक मजबूत पाए गए हैं।

आज बच्चों का बचपन स्क्रीन में सिमटता जा रहा है। मोबाइल, वीडियो गेम और बंद कमरों ने उन्हें प्रकृति से दूर कर दिया है। इससे मोटापा, आंखों की कमजोरी, चिड़चिड़ापन और सामाजिक अलगाव बढ़ रहा है।

स्कूलों और परिवारों को बच्चों को प्रकृति से जोड़ने की जरूरत है।

  • पार्क में समय
  • बागवानी
  • पेड़ लगाना
  • खुले में खेलना
  • पक्षियों और पौधों से परिचय

यह केवल मनोरंजन नहीं बल्कि स्वास्थ्य में निवेश है।

प्राकृतिक चिकित्सा की बढ़ती प्रासंगिकता

दुनिया भर में प्राकृतिक चिकित्सा की ओर लोगों का झुकाव बढ़ रहा है। योग, ध्यान, आयुर्वेद, नेचुरोपैथी और वन-चिकित्सा (Forest Therapy) का महत्व फिर से समझा जा रहा है।

प्राकृतिक चिकित्सा का आधार यह है कि शरीर स्वयं को ठीक करने की क्षमता रखता है, बशर्ते उसे सही वातावरण मिले। पर्याप्त नींद, शुद्ध भोजन, स्वच्छ पानी, सूर्य प्रकाश और मानसिक शांति शरीर की प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली को सक्रिय करते हैं।

भारत जैसे देश में जहां प्रकृति आधारित चिकित्सा की समृद्ध परंपरा है, वहां स्वास्थ्य नीति में प्रकृति को अधिक महत्व दिया जा सकता है।

पर्यावरण संरक्षण ही स्वास्थ्य संरक्षण

यदि हम वास्तव में स्वास्थ्य सुधारना चाहते हैं तो हमें पर्यावरण की रक्षा करनी होगी। क्योंकि प्रदूषित हवा मतलब बीमार फेफड़े, दूषित पानी यानी कमजोर शरीर, रासायनिक भोजन यानी जीवनशैली से जुड़े रोग, शोर प्रदूषण से मानसिक तनाव एवं हरियाली की कमी से  कमजोर मानसिक स्वास्थ्य की समस्या होती है।

इसलिए स्वास्थ्य मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय के बीच समन्वय आवश्यक है। स्वास्थ्य केवल अस्पतालों में नहीं, बल्कि जंगलों, नदियों और खेतों में भी बनता है।

सेहत का सवाल केवल डॉक्टर, दवा और अस्पताल तक सीमित नहीं है। यह हमारे प्रकृति से रिश्ते का सवाल भी है। जब तक मनुष्य प्रकृति से कटता रहेगा, तब तक स्वास्थ्य संकट गहराता जाएगा।

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया

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