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मोदी ने क्यों कही, ‘फोर्थ पार्टी ऑडिट’ की बात…क्या वाकई गंभीर है सरकार…?

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नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र) :  क्या देश में सचमुच गैर सरकारी संस्थाओं और सेक्शन 8 कंपनीज़ एक्ट के तहत गठित संस्थाओं के बुरे दिन आने वाले हैं? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों इशारों-इशारों में सरकारी कामों के चौथे ऑडिट की बात करके काफी कुछ कह दिया था कि आने वाले समय में सरकार इस दिशा में बहुत कड़े कदम उठाने वाली है। बात यहां तक आ पहुंची है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस मामले में सांसदों समेत सभी जनप्रतिनिधियों की संस्तुतियों से संबंधित जानकारियां भी तलब की हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय के भरोसेमंद सूत्रों की मानें तो सार्वजनिक उपक्रमों के अलावा ऐसी सभी सरकारी संस्थाओं से जानकारियां मांगी गई हैं जिनके लिए सांसदों ने संस्तुतियां दी हैं। जानकारी में विशेषतौर पर इस बात पर गौर किया जाना है कि किन संस्थाओं और किन व्यक्तियों के विभिन्न संगठनों के लिए अमुख सांसद ने लगातार पैरवी की है।

सरकार का विशेष जोर ऐसी ही संस्तुतियों पर आधारित विकास कार्यों के चौथे ऑडिट पर है। ये चौथा ऑडिट किससे और कैसे कराया जाएगा यह खुद पीएमओ ही तय करेगा। सूत्रों की मानें तो सरकार मान कर चल रही है कि देश में बड़े पैमाने पर जनप्रतिनिधियों के हवाले से विकास कार्यों के लिए आंवटित निधि का दुरुपयोग किया जा रहा है। सरकार की अपनी जांच में यह भी पाया गया है कि अधिकतर घोटालों में अप्रत्यक्ष तौर पर कहीं न कहीं जन प्रतिनिधियों की भी संलिप्तता है। सूत्र यह भी बताते हैं कि मामले की जांच के बाद गड़बड़ी पाए जाने पर सरकारी धन की रिकवरी का सख्त प्रावधान भी किया जा रहा है। हालांकि यह प्रावघान पहले से मौजूद है लेकिन जैसे-तैसे करके घोटालेबाज संस्थाएं दाएं-बाएं से इससे बचकर निकल जाती हैं।

अचानक सरकार क्यों सक्रिय हुई ?

पिछले दिनों देश में विकास कार्यों से लेकर मिड डे मील तक ऐसे ढेरों मामले सामने आए जिसमें सरकारी धन का जबरदस्त दुरुपयोग पाया गया और सरकार की किरकिरी हुई। यह मामला तब और जोर पकड़ा जब कॉक्रोच जनता पार्टी ने स्कूलों की व्यवस्था पर सवाल उठाना शुरू किया। सभी जिलों के जिलाधिकारियों से जब स्कूलों के लिए संरक्षित निधि के बारे में जानकारी मांगी गई तब पता चला कि अधिकतर स्कूलों में तमाम जगहों से फंड तो आए लेकिन वे सब गए कहां इस बारे में कोई ठोस जवाब नहीं था। सबसे जोरदार बात तो यह रही कि पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई स्कूलों में कंप्यूटरों और शौचालयों के नाम पर जनप्रतिधियों की संस्तुतियों या उनके खुद के फंड से पैसा आया लेकिन काम बहुत ही घटिया हुआ। सरकार मानती है कि सब बंदरबांट का खेल है और इसके लिए संबंधित जनप्रतिनिधि सहित उस गैर सरकारी संस्था को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

देश में कितने NGO , पैसा कहां से आता है और जवाबदेही किसकी ?

भारत में गैर-सरकारी संगठन यानी NGO लंबे समय से सामाजिक बदलाव, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तीकरण, बाल अधिकार, ग्रामीण विकास, पर्यावरण और गरीबों के बीच काम करने वाली महत्वपूर्ण संस्थाओं के रूप में सामने आए हैं। सरकार जहां नहीं पहुंच पाती, वहां कई बार NGO पहुंचते हैं। आपदा, महामारी या प्राकृतिक संकट के समय भी अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं ने उल्लेखनीय काम किया है।

लेकिन NGO क्षेत्र का दूसरा पक्ष भी है। सरकारी अनुदान, विदेशी चंदा, कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व यानी CSR का पैसा और जनता से प्राप्त दान यदि पर्याप्त पारदर्शिता के बिना खर्च हो तो सवाल उठना स्वाभाविक है। यही वजह है कि आज NGO के ऑडिट, वित्तीय पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर सरकार सक्रिय़ होती दिख रही है।

भारत में NGO कोई एक कानूनी श्रेणी नहीं है। गैर-सरकारी संगठन अलग-अलग कानूनों के तहत पंजीकृत हो सकते हैं। इनमें प्रमुख हैं-Societies Registration Act के तहत पंजीकृत सोसायटी, विभिन्न राज्यों के कानूनों के तहत पंजीकृत ट्रस्ट और Companies Act, 2013 की धारा 8 के तहत गठित कंपनियां।

इसके अलावा NITI Aayog का NGO-DARPAN पोर्टल है, जिस पर स्वैच्छिक संगठनों को पंजीकरण की सुविधा दी जाती है। लेकिन NGO-DARPAN पर दर्ज संस्थाओं की संख्या को देश में मौजूद कुल NGO की संख्या मान लेना सही नहीं होगा।

सवाल ऑडिट का नहीं, ऑडिट की गुणवत्ता का है

NGO के लिए वित्तीय लेखा-परीक्षण कोई नई अवधारणा नहीं है। पात्र संस्थाओं को अपने स्वरूप और प्राप्त धन के अनुसार अलग-अलग कानूनों के तहत लेखांकन, ऑडिट और रिटर्न दाखिल करने होते हैं।

आयकर कानून, Companies Act, विदेशी अंशदान विनियमन कानून यानी FCRA और CSR से जुड़े नियमों के तहत भी अलग-अलग अनुपालन हो सकते हैं।

समस्या तब पैदा होती है जब ऑडिट केवल कागजों की औपचारिकता बन जाए। किसी संस्था के खाते का ऑडिट हो गया, इसका अर्थ यह नहीं कि उसके हर खर्च की सामाजिक उपयोगिता भी प्रमाणित हो गई। मसलन, किसी NGO ने किसी परियोजना पर एक करोड़ रुपये खर्च किए। ऑडिटर यह देख सकता है कि भुगतान दस्तावेज मौजूद हैं, बिल हैं, बैंक से रकम निकली है और खाते नियमों के अनुसार तैयार हैं। लेकिन क्या उस एक करोड़ रुपये से वास्तव में वही काम हुआ जिसके लिए पैसा मिला था? कितने लाभार्थियों तक उसका लाभ पहुंचा? निर्माण की गुणवत्ता कैसी थी? परियोजना जमीन पर मौजूद भी है या नहीं?

सरकारी पैसा आए तो जवाबदेही भी बढ़नी चाहिए

NGO क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण सवाल सरकारी धन और सार्वजनिक संसाधनों का है। यदि सरकार किसी संस्था को किसी योजना के तहत अनुदान देती है तो वह पैसा मूलतः जनता के संसाधनों से आता है। ऐसे में संस्था को यह बताना चाहिए कि पैसा किस उद्देश्य से मिला, कितनी राशि खर्च हुई, किन लोगों को लाभ मिला और कितना पैसा बचा।

CSR के मामले में भी यही प्रश्न महत्वपूर्ण है। कंपनियां सामाजिक उत्तरदायित्व के तहत बड़ी रकम खर्च करती हैं। यह पैसा सीधे सरकारी खजाने का हिस्सा न हो, लेकिन इसका उपयोग सार्वजनिक हित के कामों के लिए होता है। इसलिए पारदर्शिता यहां भी जरूरी है।

विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों पर FCRA के तहत अलग नियमन लागू होता है। विदेशी योगदान के स्रोत, बैंक खातों और उसके उपयोग पर निगरानी का उद्देश्य यही है कि विदेशी धन का इस्तेमाल निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप हो।

इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। NGO पर निगरानी जरूरी है, लेकिन निगरानी के नाम पर ऐसे संगठनों को परेशान नहीं किया जाना चाहिए जो ईमानदारी से सरकार से स्वतंत्र होकर नागरिक अधिकारों और जनहित के मुद्दे उठाते हैं।

NGO के नाम पर फर्जीवाड़ा कैसे होता है?

NGO क्षेत्र की सबसे बड़ी कमजोरियों में से एक है- कागज पर संस्था और जमीन पर निष्क्रियता। कई संस्थाएं पंजीकृत तो हो सकती हैं, लेकिन नियमित रूप से कोई महत्वपूर्ण गतिविधि नहीं करतीं। दूसरी ओर कुछ संस्थाएं परियोजनाओं के नाम पर खर्च दिखाकर वास्तविक काम कम कर सकती हैं।

संभावित गड़बड़ियों के तरीके अनेक हो सकते हैं जैसे,

  • फर्जी या बढ़े हुए बिल बनाना।
  • एक ही परियोजना पर अलग-अलग स्रोतों से पैसा लेना।
  • कर्मचारियों और परामर्श सेवाओं के नाम पर संदिग्ध भुगतान।
  • संबंधित व्यक्तियों या कंपनियों को ठेके देना।
  • संस्था के संसाधनों का निजी उपयोग।
  • लाभार्थियों की संख्या बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना।
  • कागज पर प्रशिक्षण, स्वास्थ्य शिविर या विकास कार्यक्रम दिखाना।
  • जमीन पर अधूरा काम और कागज पर पूरा भुगतान।
  • राजनीतिक या कारोबारी प्रभाव के कारण कमजोर निगरानी।

सांसद और विधायक – कितनी भूमिका?

NGO और राजनीति का संबंध सबसे संवेदनशील हिस्सा है। देश में अनेक राजनेता सामाजिक संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। कुछ सांसद और विधायक स्वयं सामाजिक या धर्मार्थ संस्थाएं चलाते हैं। कुछ संस्थाओं में उनके परिवार के सदस्य, सहयोगी या करीबी लोग पदाधिकारी हो सकते हैं।

सिर्फ किसी NGO से किसी सांसद या विधायक का संबंध होना अपने आप में अपराध नहीं है। सामाजिक काम करना और संस्था चलाना लोकतांत्रिक अधिकार है।

समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक पद और NGO की आर्थिक गतिविधियों के बीच हितों का टकराव पैदा हो।

मसलन, यदि कोई निर्वाचित जनप्रतिनिधि किसी संस्था से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ा है और वही संस्था सरकारी परियोजना, अनुदान या ठेका प्राप्त करती है, तो सवाल उठ सकता है कि निर्णय प्रक्रिया कितनी स्वतंत्र थी।

इसी तरह यदि किसी NGO को सरकारी विभाग से लगातार अनुदान मिल रहा है और उसके संचालक सत्ताधारी दल के राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लोगों के करीबी हैं, तो पारदर्शिता के लिए अतिरिक्त जांच उचित हो सकती है।

इसके बावजूद एक बड़ा प्रश्न है, क्या NGO को राजनीतिक संरक्षण मिलने से निगरानी कमजोर हो सकती है? सैद्धांतिक रूप से इसका उत्तर हां है। जहां पैसा, राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक शक्ति एक-दूसरे से जुड़ते हैं, वहां हितों के टकराव की संभावना हमेशा रहती है।

यही बात केवल सत्तारूढ़ दल पर लागू नहीं होती। किसी भी राजनीतिक दल से जुड़े लोगों और संस्थाओं के लिए समान पारदर्शिता का सिद्धांत होना चाहिए।

अगर किसी NGO का संचालक किसी पार्टी से जुड़ा है तो इसका मतलब यह नहीं कि संस्था गलत है। लेकिन अगर उसे सरकारी धन मिलता है तो उसके खातों और निर्णय प्रक्रिया की जांच उसी कठोरता से होनी चाहिए जैसी किसी दूसरे NGO की।

आपको बता दें कि, इस समय नीति आयोग की वेबसाइट दर्पण पर 2.6 लाख से अधिक एनजीओ पंजीकृत हैं जबकि इनकी वास्तविक संख्या कहीं ज्यादा है। कॉरपोरेट मामलों के आंकड़ों के अनुसार सेक्शन 8 कंपनीज़ एक्ट के तहत गठित संस्थाओं की संख्या 30 हजार से ज्यादा है। इसी तरह एफसीआरए के तहत पंजीकृत एवं सक्रिय संस्थाएं 17000 के करीब हैं।

फोटो सौजन्य- सोशल मीडिया    

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