नई दिल्ली ( गणतंत्र भारत के लिए अनिल तिवारी ) : हमारी पुलिस की वर्तमान स्थिति को लेकर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है। हाल के दिनों में सामने आई कुछ घटनाओं को देखें तो ऐसा प्रतीत होता है कि पुलिस किस तरह अनेक प्रकार के दबावों के बीच अपने दायित्वों का निर्वहन कर रही है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी परिस्थितियाँ क्यों पैदा हो रही हैं, जिनमें पुलिस से कभी-कभी सत्तारूढ़ राजनीतिक दल की विचारधारा और राजनीतिक प्राथमिकताओं के अनुरूप काम करने की अपेक्षा की जाती है?
यह प्रश्न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली का नहीं, बल्कि हमारे लोकतंत्र और संवैधानिक व्यवस्था की मजबूती का प्रश्न है।
भारत की वर्तमान पुलिस व्यवस्था की बुनियाद मुख्यतः पुलिस अधिनियम, 1861 में निहित है। 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश शासन ने जिस पुलिस व्यवस्था को विकसित किया, उसका मूल उद्देश्य जनता की सेवा करने के बजाय औपनिवेशिक सत्ता की रक्षा करना और शासन के विरुद्ध किसी भी चुनौती को नियंत्रित करना था। पुलिस, राज्य शक्ति का एक प्रमुख उपकरण थी।
उस व्यवस्था में नागरिक अधिकारों, लोकतांत्रिक जवाबदेही और मानवाधिकारों की वह प्राथमिकता नहीं थी, जो आज एक लोकतांत्रिक गणराज्य में होनी चाहिए।
आजादी मिली, लेकिन पुलिस व्यवस्था कितनी बदली?
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ और 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ। हमने स्वयं को एक लोकतांत्रिक, गणराज्य और कानून के शासन पर आधारित राष्ट्र के रूप में स्थापित किया।
ऐसे में सबसे स्वाभाविक अपेक्षा यह थी कि औपनिवेशिक शासन के लिए बनाई गई पुलिस व्यवस्था को भी संविधान की भावना के अनुरूप पूरी तरह पुनर्गठित किया जाता।
लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।
आजादी के बाद भी पुलिस का मूल ढांचा काफी हद तक उसी औपनिवेशिक विरासत को ढोता रहा। समय-समय पर पुलिस सुधार की आवश्यकता महसूस की गई। अनेक आयोगों और समितियों ने सुझाव दिए, लेकिन उनके अधिकांश महत्वपूर्ण सुझावों को प्रभावी और पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका।
इसका एक बड़ा कारण शायद यह भी रहा कि, पुलिस पर राजनीतिक नियंत्रण की वही व्यवस्था, जो कभी अंग्रेजी शासन के लिए उपयोगी थी, बाद की सरकारों के लिए भी सुविधाजनक बनी रही।
विपक्ष में रहते हुए राजनीतिक दल अक्सर पुलिस के राजनीतिक दुरुपयोग की शिकायत करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद वही व्यवस्था उन्हें क़तई बुरी नहीं लगती। सत्ता बदलती रही, लेकिन पुलिस और राजनीति के संबंधों का मूल स्वरूप बहुत हद तक बना रहा।
प्रकाश सिंह मामला और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश
पुलिस सुधार के इतिहास में प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यूपी के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह द्वारा 1996 में दायर जनहित याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में पुलिस को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने और उसकी पेशेवर स्वायत्तता सुनिश्चित करने के लिए सात महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए।
इनमें प्रमुख थे –
राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, ताकि पुलिस पर अनुचित राजनीतिक दबाव कम हो।
डीजीपी की योग्यता-आधारित नियुक्ति और न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल।
महत्वपूर्ण पुलिस अधिकारियों का न्यूनतम कार्यकाल तय़ किया जाए ताकि बार-बार होने वाले राजनीतिक तबादलों पर अंकुश लगे।
जांच और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारियों को अलग करना ताकि जांच अधिक पेशेवर और निष्पक्ष हो।
पुलिस स्थापना बोर्ड का गठन, जिससे तबादलों और पदस्थापनाओं में राजनीतिक हस्तक्षेप कम हो।
पुलिस शिकायत प्राधिकरण की स्थापना, ताकि पुलिस के विरुद्ध नागरिकों की शिकायतों की स्वतंत्र जांच हो सके।
केंद्रीय पुलिस संगठनों के प्रमुखों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा आयोग की व्यवस्था।
इन निर्देशों के पीछे मूल भावना यही थी कि पुलिस सरकार की नहीं, कानून की एजेंसी बने; किसी राजनीतिक दल की नहीं, संविधान की प्रहरी बने।
लेकिन लगभग दो दशक बीत जाने के बाद भी इन सुधारों का पूर्ण और प्रभावी क्रियान्वयन अनेक राज्यों में अधूरा है।
सबसे बड़ा खतरा क्या है?
पुलिस के लिए सरकार के प्रति प्रशासनिक जवाबदेही आवश्यक है। आखिरकार सरकार लोकतांत्रिक रूप से चुनी जाती है। लेकिन सरकार और सत्तारूढ़ राजनीतिक दल में अंतर है।
सरकार संविधान और कानून के अनुसार चलती है; राजनीतिक दल अपनी विचारधारा और राजनीतिक हितों के अनुसार।
जब यह अंतर मिटने लगता है और पुलिस से किसी राजनीतिक विचारधारा, राजनीतिक हित या बहुसंख्यक जनभावना के अनुरूप कार्रवाई की अपेक्षा की जाने लगे, तब समस्या केवल पुलिस की नहीं रहती बल्कि लोकतंत्र की संस्थागत निष्पक्षता ही खतरे में पड़ जाती है।
पुलिस की वर्दी किसी राजनीतिक दल की पहचान नहीं हो सकती। वह आवश्यक रूप से केवल संविधान की प्रतिनिधि ही होनी चाहिए।
एक पुलिस अधिकारी को यह नहीं सोचना चाहिए कि सामने वाला व्यक्ति किस धर्म, जाति, विचारधारा या राजनीतिक दल का समर्थक है। उसके लिए केवल एक प्रश्न महत्वपूर्ण होना चाहिए , कानून क्या कहता है?
पुलिस को सरकार की नहीं, संविधान की पुलिस बनाना होगा
यह भी समझना होगा कि पुलिसकर्मी स्वयं इस व्यवस्था के सबसे बड़े पीड़ितों में से हैं। एक तरफ राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव, दूसरी तरफ संसाधनों की कमी, अत्यधिक कार्यभार, लंबे कार्य घंटे और जनता की बढ़ती अपेक्षाएँ और इन सबके बीच उनसे निष्पक्ष और पेशेवर पुलिसिंग की उम्मीद की जाती है।
इसलिए समाधान केवल पुलिस से अधिक ईमानदारी की अपेक्षा करने में नहीं है। बल्कि पूरी व्यवस्था को बदलने की आवश्यकता है।
पुलिस की नियुक्ति, पदस्थापना और स्थानांतरण में राजनीतिक हस्तक्षेप कम से कम करना होगा। जांच को स्वतंत्र और पेशेवर बनाना होगा। पुलिस शिकायतों की स्वतंत्र व्यवस्था को प्रभावी बनाना होगा। पुलिसकर्मियों को आधुनिक प्रशिक्षण, पर्याप्त संसाधन और काम करने की गरिमापूर्ण परिस्थितियाँ देनी होंगी।
और सबसे महत्वपूर्ण है कि राजनीतिक नेतृत्व को यह स्वीकार करना होगा कि पुलिस किसी भी सरकार की निजी संस्था नहीं है। वह जनता के पैसे से चलती है, संविधान के अधीन काम करती है और कानून के शासन की रक्षा करती है।
आज यदि हम इस प्रश्न को पूरी गंभीरता से नहीं पूछेंगे कि हमारी पुलिस किसके प्रति जवाबदेह है, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे यह सवाल अवश्य पूछेंगी।
फोटो सौजन्य़- सोशल मीडिया

