Homeकृषिफलों - सब्जियों के इस 'रासायनिक' बाजार से हो जाएं सावधान

फलों – सब्जियों के इस ‘रासायनिक’ बाजार से हो जाएं सावधान

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नई दिल्ली (गणतंत्र भारत  के लिए पंकज सिंह) : भारत में फल – सब्जियां हर उपभोक्ता के आहार का आवश्यक हिस्सा होती हैं और स्वास्थ्य व जागरूकता के बढ़ते स्तर के साथ उपभोक्ता इनका सेवन और भी विविध व संगठित रूप में कर रहे हैं। घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (HCES) 2022-23 के अनुसार भारत के ग्रामीण-क्षेत्र में सब्जियों पर मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय लगभग 240 से 260 रुपए के बीच है वहीं शहरी-क्षेत्र में प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय लगभग 250-280 रुपए के बीच बताया गया है।

बदलती जीवनशैली, स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं और जागरूकता के कारण भारतीय उपभोक्ताओं में सब्जी खाने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। पोषण अभियान और Eat Right India  जैसी योजनाएं लोगों को संतुलित आहार और सब्जियों के महत्व के प्रति प्रेरित कर रही हैं।

शहरी क्षेत्रों में उपभोक्ता धीरे-धीरे अधिक हरी सब्जियां अपनाने लगे हैं। घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2022-23 के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में ताज़ा फलों और सब्जियों का सेवन करने वाले घरों की संख्या 63.8%  (2011 ) से बढ़कर 90.3% हो गई है। शहरी इलाकों में भी बढ़ोतरी हुई है, जो लगभग 76% घर 2011-12 में ताज़े फल और सब्जियां खा रहे थे, अब 2022-23 में यह आंकड़ा बढ़कर 94.1% हो गया है।

भारत में फल और सब्जी उत्पादन सिर्फ पोषण सुरक्षा ही नहीं देता, बल्कि ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन भी करता है। कुल कृषि उत्पादन का लगभग 32–34% हिस्सा फल-सब्जियों से आता है। अनुमान है कि बागवानी क्षेत्र से 2 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रोजगार मिला हुआ है। करोड़ों छोटे और सीमांत किसान फल व सब्जी की खेती करते हैं।

भारत फल और सब्जी उत्पादन में विश्व का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत का वैश्विक फल उत्पादन में योगदान 12% और सब्जियों में 15% है। फल व सब्जी बाजार का मूल्य

2025 में लगभग  48.8 अरब अमेरिकी डॉलर आंका गया है, और यह 2031 तक 5.1% की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़कर  65.79 अरब अमेरिकी डॉलर होने की संभावना है । भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) की सिफारिश के अनुसार, एक व्यक्ति को प्रतिदिन 400 ग्राम फल व सब्जी (मिलाकर) खाना चाहिए। भारत में सब्जी और फल की औसत वास्तविक खपत 250 से 300 ग्राम प्रति व्यक्ति प्रतिदिन ही है, जो की आवश्यकता से कम है ।

फल-सब्जी उत्पादन प्रक्रिया से बीमारियां बढ़ी

बाजार की आपूर्ति के लिए सब्जियों की उत्पादन प्रक्रिया में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग भले ही किसान के लिए आसान और उत्पादन बढ़ाने वाला हो, लेकिन इस तरह की खेती से गंभीर दुष्प्रभाव सामने आ रहे हैं। रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से न केवल मिट्टी की उर्वरता घट रही है, बल्कि जल स्रोत भी प्रदूषित हो रहे हैं। सब्जियों में बचे रासायनिक अवशेष मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बन रहे हैं,  जो कैंसर, हार्मोन असंतुलन और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों का कारण हो सकते हैं। इसके अलावा, जैव विविधता प्रभावित हो रही है और किसान महंगे रसायनों पर निर्भर होते जा रहे हैं।

मुनाफे के लालच में उपभोक्ताओं को कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी दी जा रही है । भारत में जिस एथलीन गैस से आम, केला, पपीता आदि को पकाने की मंजूरी है वह सिस्टम राइपनिंग चेंबर कहलाता है। राइपनिंग चेंबर में निश्चित पैमाने पर एथिलीन गैस से फलों को सुरक्षित व कृत्रिम तरीके से पकाया जाता है। 11 क्यूबिक मीटर के चैम्बर में एक हजार किलो फल को पकने में एक लाख रूपये का खर्च आता है। यह प्रक्रिया महंगी होने से व्यापारी जहरीले रसायन का प्रयोग कर फलों को पकाते हैं। भारत में FSSAI ने खाद्य सुरक्षा और मानक (संदूषक, विषाक्त पदार्थ और अवशेष) विनियम, 2011 के अंतर्गत फल- सब्जियों में कीटनाशक और अन्य रसायनिक अवशेषों के लिए मानक स्थापित किये हैं किन्तु इसका पालन न हो कर कानून का खुल्लेआम उलंघन हो रहा है। WHO और FSSAI की रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में सब्जियों पर अक्सर अनुशंसित सीमा से कई गुना अधिक कीटनाशक पाए जाते हैं। फल और सब्जी पर कीटनाशक अवशेष लंबे समय तक बने रहते हैं । सब्जियों की खेती में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का अत्यधिक प्रयोग आज एक गंभीर समस्या बन चुका है। देश में 100 से भी ज्यादा प्रतिबंधित कीटनाशक खुलेआम बिक रहे हैं।

कीटनाशकों का असर सबसे ज्यादा सब्जियों पर

लंबे समय से, किसान फसलों पर लगने वाले कीटों को नियंत्रित करने के लिए पारंपरिक और सामान्य तरीकों का इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन बढ़ती मांग और वर्षों से मिट्टी की खराब गुणवत्ता के कारण, अब किसान कीटनाशकों और उर्वरकों के आदी हो गए हैं। कीटनाशकों के इस्तेमाल से सब्जियों का उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलती है। कीटनाशक सब्जियों की शेल्फ लाइफ भी बढ़ाते हैं। कीटनाशकों के इस्तेमाल के कई तरीके हैं, लेकिन किसानों द्वारा सीधे छिड़काव ही दूषित उपज का मुख्य स्रोत है।

सबसे अधिक कीटनाशक और कीटनाशक अवशेषों वाली सब्जियां

FSSAI के एक अध्यन में पाया गया है कि कुल 12,821 सब्जी नमूनों में से 18.7% में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए। इनमें से केवल 1.9% नमूनों में कीटनाशकों के अवशेष FSSAI द्वारा निर्धारित अधिकतम सीमा से अधिक थे। सबसे अधिक क्लोरपाइरीफॉस, सायपरमेथ्रिन, एंडोसल्फान और डीडीटी के अवशेष सब्जियों में मिलते हैं। हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय पोषण संस्थान (एनआईएन) के अनुसार, थोक और खुदरा बाज़ारों में बिकने वाली सब्ज़ियों में 40 से ज़्यादा विभिन्न प्रकार के कीटनाशक अवशेष पाए जाते हैं जो स्वीकार्य सीमा से ज़्यादा हैं। सबसे ज़्यादा कीटनाशक अवशेष भिंडी, पालक, बैंगन, फूलगोभी, पत्तागोभी, आलू,  मूली, टमाटर, तीखी मिर्च और केले में पाए जाते हैं।

रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों में फंसा है किसान

सब्जियों के उत्पादन में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का प्रयोग किसान की मजबूरी बन गई है क्यूंकि बाजार में ताज़ी, चमकदार और अधिक मात्रा वाली सब्जी बिकती है। रासायनिक खाद और दवाइयों से फसल दिखने में बेहतर लगती है, जिससे बाजार में अच्छा दाम मिलता है। किसान रासायनिक आधारित खेती के हानिकारक परिणाम से अच्छी तरह अवगत हैं लेकिन उन्हें जल्दी उपज और नकद की जरूरत होती है, इसलिए वे रासायनिक खेती पर निर्भर रहते हैं। वाराणसी के किसान सतीश पटेल कहते हैं कि, ‘बाजार में हरी और चमकदार सब्जियां आसानी से अच्छे दाम पर बिक जाती हैं जिसके उत्पाद के लिए रासायनिक दवाओं कि जरूरत होती है। स्वयं के उपभोग के लिए वह अलग खेत में प्राकृतिक खेती आधारित सब्जी का उत्पादन करते हैं।’

यह भी सही है कि, अधिकांश उपभोक्ता यह जानते हैं कि सब्जी उत्पादन में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का प्रयोग होता है, परंतु उन्हें इनके लंबे समय तक स्वास्थ्य पर प्रभाव की स्पष्ट जानकारी कम होती है।

प्राकृतिक खेती है विकल्प

रसायन युक्त खेती का एक मात्र विकल्प प्राकृतिक खेती है जिससे मिट्टी की उर्वरता लंबे समय तक बनी रहती है, उत्पादन सुरक्षित और स्वास्थ्यवर्धक होता है और साथ ही पर्यावरण और जल स्रोत भी सुरक्षित रहते हैं। खेती की लागत घटती है क्योंकि रसायन कीटनाशक और उर्वरक पर किसान की निर्भरता समाप्त हो जाती है। रसायन संसाधन के जगह प्राकृतिक संसाधनों, जैविक खाद, गोबर, हरी खाद, का प्रयोग किया जाता है। भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए परम्परागत कृषि विकास योजना है जिसके अंतर्गत किसानों को प्राकृतिक खेती के लिए आर्थिक मदद, प्रशिक्षण और प्रमाणन उपलब्ध कराया जाता है ताकि कृषि टिकाऊ, सुरक्षित और लाभकारी बने। वाराणसी के सब्जी किसानों के साथ प्राकृतिक खेती पद्धति के लिए कार्यरत संस्था ईको प्रिज्म कलेक्टिव फाउंडेशन के परियोजना संयोजक संजय पटेल बताते है कि, ‘प्राकृतिक खेती पद्धति किसानों के लिए आसान तथा शून्य बजट की खेती है, परन्तु इसमें उत्पादन कम होने की वजह से किसान इसे अपनाने के लिए तभी तैयार होते है जब उनके उत्पाद के अच्छे दाम मिलने की गारंटी होती है।’

उपभोक्ता संरक्षण प्रावधान

भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) खाद्य सुरक्षा के लिए प्राथमिक नियामक संस्था है  जिसमें बिना पैकेज वाले फल और सब्ज़ियां भी शामिल हैं। यह संस्था स्वच्छ एवं ताज़ा फल एवं सब्ज़ी बाज़ार पहल के माध्यम से असंगठित क्षेत्रों को उन्नत बनाने, फलों और सब्जियों में कीटनाशकों और रसायनों की अधिकतम अवशेष सीमा (MRL) निर्धारित करती है। बाजार में स्वच्छ एवं गुणवत्ता उत्पाद की बिक्री हो इसके लिए विक्रेता प्रशिक्षण सुनिश्चित करने का प्रयास करती है। पैक किए गए फलों, सब्जियों पर उत्पादन क्षेत्र, ग्रेडिंग और रसायन रहित/ऑर्गेनिक टैग अनिवार्य किए जाते हैं। ऑर्गेनिक प्रमाणन लाइसेंस जैविक तरीके से उगाई गई फसलों को विशेष प्रमाण पत्र मिलता है जिससे उपभोक्ता सुरक्षित विकल्प चुन सकें। यदि कोई विक्रेता इन मानकों का उल्लंघन करता है या अस्वास्थ्यकर उत्पाद बेचता है, तो उपभोक्ता FSSAI या उपभोक्ता मंचों में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। उपभोक्ता संरक्षण कानून 2019 के अंतर्गत भी उपभोक्ताओं को स्वच्छ एवं सुरक्षित उत्पाद बाजार में प्राप्त हो इनके लिए विभिन्न अधिकार दिए गए हैं। इसके अलावा, राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (एनसीएच) पोर्टल के माध्यम से या टोल-फ्री नंबर 1915 पर कॉल करके  ताज़ी उपज सहित  असंतोषजनक या असुरक्षित वस्तुओं के बारे में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।

(फोटो साभार- सोशल मीडिया) 

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