नई दिल्ली (गणतंत्र भारत के लिए आशीष मिश्र): यूनानी दार्शनिक अरस्तू जब ‘पॉलिटिकस’ नामक राजनीतिक ग्रंथ की रचना कर रहे थे तब वे अपने शिष्यों के साथ अक्सर पॉलिटिकल डिस्कोर्स पर चर्चा किया करते थे। ऐसी चर्चाओं में कई दिलचस्प मोड़ आते थे। ऐसी ही एक चर्चा में डेमोक्रेसी और मॉबोक्रेसी में फर्क पर चर्चा आ खड़ी हुई। शिष्य डेमोक्रसी और मॉबोक्रेसी में कोई अंतर नहीं देखते थे जबकि अरस्तू की नजर में दोनों में बहुत बड़ा फर्क था।
वो फर्क क्या था ? अरस्तू ने अपने शिष्यों से कहा कि डेमोक्रेसी और मॉबोक्रेसी दोनों में फर्क विश्वास का है। अपने सिस्टम पर भरोसे का है। डेमोक्रेसी में जनता का अपने तंत्र पर भरोसा रहता है और उसे यकीन होता है कि यह सिस्टम समाज के हर वर्ग के हित को ध्यान में रखेगा। यही सोच उस व्यवस्था की रीढ़ होती है। इसके उलट मॉबोक्रेसी एक भीड़ से अलग कुछ नहीं होती। लोगों का ऐसा हुजूम जो उन्मादी हो सकता है, अपने संख्याबल की ताकत को ही अपनी ताकत मानता है, उसे विरोध सहन नहीं होता और विरोधी उसके दुश्मन होते हैं।
हजारों साल पहले जब पॉलिटिकस की रचना हो रही थी तब जनसंख्या तो बहुत सीमित थी लेकिन शायद तब उन्माद का ज्यादा बोलबाला था। छोटे-छोटे राज्य होते थे जो एक दूसरे को खत्म करने पर अमादा होते थे। इसी अरस्तू के शिष्य अलेक्जेंडर तो दुनिया जीतने निकल पड़े थे। यानी उस समय विरोधी विचारो के लिए कोई जगह नहीं थी। ऐसे समय में अरस्तू ने लोकतंत्र यानी डेमोक्रेसी और मॉबोक्रेसी में जो फर्क दुनिया के सामने रखा वो आज भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिहाज से एक मिसाल है।
अरस्तू ने लोकतंत्र की जिस रीढ़ के बारे में बात की वो और कुछ नहीं सिर्फ अपने सिस्टम पर भरोसे की बुनियाद पर टिका था। दूसरे शब्दों में कहें तो लोकतंत्रिक व्यवस्था में अगर लोक यानी जनता का विश्वास अपने सिस्टम पर से उठ जाए तो वो किसी काम का नहीं रह जाता है।
भारत के संदर्भ को लेते हैं। बात लोकतंत्र के चार बड़े स्तंभों से शुरू करते हैं। सैद्धांतिक बातों से अलग यहां बात सरकार, अदालत, समाज और मीडिया को लोकतंत्र के चार स्तभों के रूप में देखते हुए शुरू करते हैं। व्यवस्थापिका और कार्यपालिका को हमने सरकार का नाम दिया है और चौथे स्तंभ के रूप में समाज को स्थान दिया है।
सरकार की विश्वसनीयता का संकट
सरकार में व्यवस्थापिका, कार्यपालिका, ब्यूरोक्रेसी, सरकारी एजेंसियां, चुनावी प्रणाली सभी कुछ शामिल है। क्या ऐसा नहीं लगता कि इन सभी ने सिस्टम के एक अंग के रूप में अपनी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है? ऐसी नौबत कैसे आ गई कि प्रधानमंत्री से लेकर मंत्री तक किसी की भी बात भरोसे के काबिल नहीं रह गई। शक के दायरे में है। प्रधानमंत्री की घोषणाओं की विश्वसनीयता पर शक होना भी लाजमी है। उन्हीं के मंत्री उसे जुमला बता देते हैं। प्रधानमंत्री ने स्मार्ट सिटी से लेकर, किसानों की आय़ दोगुनी करने, नमामि गंगे, रोजगार और उद्योग को लेकर जितने दावे जनता के बीच किए, उनका क्या हुआ ? सोचिएगा, विश्वास का संकट पैदा होने की वजह है।
सरकारी एजेंसियां सरकार के इशारे पर विरोधियों की नकेल कसने के लिए इस्तेमाल होती हैं। ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स की साख अपने निम्नतम स्तर पर है। इन एजेंसियों के मामले आदालतों में जाकर खारिज हो जाते हैं। पिछले एक दशक में ईडी जैसी संस्था के सिर्फ 2 प्रतिशत मामले ही कनविक्शन तक पहुंच पाए। यह भी देखा जा रहा है कि, कल तक जो राजनेता भ्रष्टतम लोगों में गिने जाते थे, जैसे ही वे सत्तारूढ़ दल में शामिल हुए वे दूध के धुले हो गए। अजित पवार और हेमंता बिस्वशर्मा जैसे नेता इसके उदाहरण हैं।
ईडी और सीबीआई ने आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेता नेता अरविंद केजरीवाल, सतेंद्र जैन और मनीष सिसोदिया के खिलाफ केस तैयार किया। सतेंद्र जैन तो दो साल के करीब जेल में रहे लेकिन बाद में उनके खिलाफ कोई सबूत ही नहीं पाया गया। केजरीवाल और मनीष भी काफी समय जेल में रहे लेकिन उनके खिलाफ भी कोई ठोस सबूत नहीं मिला। क्यों ? क्य़ा यह विरोधी नेताओं के खिलाफ बदले की कार्रवाई नहीं है? आखिर ऐसे उदाहरणों के सामने कैसे कोई इस सिस्टम पर भरोसा कर सकता है? सवाल यहां भी सरकारी एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर उठता है।
चुनाव आयोग वैसे तो एक संवैधानिक संस्था है लेकिन पिछले दशक में चुनाव आयोग ने जिस तरह से काम किया है उसकी साख को बट्टा लगा है और उस पर भऱोसे का तो सवाल ही नहीं उठता। आम जनता भी चुनाव आयोग जैसी संस्था को मौजूदा स्वरूप में विश्वास के योग्य नहीं मानती। चुनाव आयोग का काम देश में निष्पक्ष चुनावों का संचालन करना है। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा है? ईवीएम पर सवाल नया नहीं है। बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवाणी ने ही सबसे पहले ईवीएम पर सवाल उठाए थे। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनावी मशीनरी और वोटर लिस्ट को लेकर ठोस सबूतों के साथ सवाल उठाए लेकिन चुनाव आयोग ने इसके जवाब में जितनी बेवकूफी भरे तर्क दिए उससे उसकी रही सही साख भी जाती रही। यहां भी सवाल लोकतांत्रिक मशीनरी के अंग की विश्वसनीयता का है।
इस देश में कमिटेड ब्यूरोक्रेसी का दौर हुआ करता था। नौकरशाह नियमों के तहत काम करते हुए राजनेताओं के उल्टे-सीधे कामों पर लगाम भी लगाते थे। आज हालात क्या हैं? राजनेताओ के साथ उनकी मिलीभगत के उदाहरण सबके सामने है। उत्तर प्रदेश का उदाहरण लें। यहां पुलिस और प्रशासन के वरिष्ठतम अधिकारी कांवरियों पर पुष्प वर्षा जैसे काम कर रहे हैं।आप ऐसे अफसरों से किस तरह के कमिटमेंट की उम्मीद करते हैं। ये इतने बेहया हैं कि इन्हें न तो अपनी वर्दी की कोई फिक्र है न ही अपने दायित्वों की फिक्र। संभल का एक डीएसपी अपनी सांप्रदायिक सोच का खुलेआम इजहार करता है और सरकार से उसे बाकायदा संरक्षण दिया जाता है। ऐसी ब्यूरोक्रेसी पर कैसे भरोसा किया जा सकता है? सवाल फिर से लोकतंत्र पर भरोसे के संकट का है।
अदालतों की विश्वसनीयता पर सवाल
देश में कई ऐसे मौके आए जब अदालतों के रुख ने लोकतंत्र को सहारा दिया। ऐसे भी मौके आए जब अदालती रुख ने लोकतंत्र के इस स्तंभ पर सवाल पैदा किए। कहा जाता है जब इंसान हर तरफ से हार जाता है तब वो अदालतों का रुख करता है क्योंकि उसकी निगाह में अदालतों से उसे इंसाफ की उम्मीद रहती है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों में ऐसा देखने को मिला कि तमाम मामलों में अदालती रुख ने इसकी विश्वसनीयता को शक के दायरे में ला खड़ा किया। ऐसा देखा गया कि वरिष्ठ जज कई अहम मसलों पर सुनवाई से बचते हैं। फैसलों को टाला जाता है और राजनीतिक संदेशों की प्रतिध्वनि उनके फैसलों में देखने को मिलती है। हाईकोर्ट के फैसलों की तो बात ही निराली है। कहीं बिल्कीस बानो के बलात्कारियों को अच्छे चाल-चलन पर रिहा कर दिया जाता है तो कहीं राम रहीम को चुनावी मौसम में बेल पर बेल मिलती है। हाईकोर्ट का सिटिंग जज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जाता है और देश के मुख्य न्यायाधीश की पत्नी भी ऐसे ही कार्यक्रम में हिस्सा लेती हैं। हाईकोर्ट के एक जज के घर से कमरा भर के पैसा बरामद होता है एवं सत्तारूढ़ पार्टी की प्रवक्ता को हाईकोर्ट का जज बना दिया जाता है। क्या ऐसे जजों की विश्वसनीयता पर प्रश्न नहीं उठना चाहिए? ऐसी घटनाएं एक निष्पक्ष एवं संविधान के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका की भूमिका पर सवाल उठाती हैं, या नहीं ?
मीडिया भरोसे काबिल नहीं रहा
कुछ महीनों पहले ही ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय मुख्यधारा के मीडिया ने जिस तरह की फर्जी खबरें चलाईं उससे उसकी जगहंसाई हुई। ऐसे मामलों में सरकार की चुप्पी और उनका खंडन नहीं करना और ज्यादा भ्रम की स्थिति पैदा करता है।
ऐसा नहीं है कि मीडिया पर सराकर का प्रभाव पहले की सरकारों के दौर में नहीं रहा। पहले भी सरकारी दबाव होता था लेकिन उसकी भी एक सीमा थी। सरकार को जो चीजें सूट नहीं करतीं उसे ब्लैकलैक आउट कर देना शायद पहले संभव ही नहीं था। मीडिया इस हद तक बिकाऊ और बेहया नहीं था। सरकार ने जिस तरह से मीडिया संस्थानों के विज्ञापनों को केंद्रित करके रखा है उससे उनके आर्थिक हितों पर असर पड़ता है और वे सरकार के खिलाफ बोलने की जुर्रत नहीं करते हैं। जिन लोगों ने मुंह खोला उनके खिलाफ ईडी, इनकम टैक्स और सीबीआई है ही।
एक स्वस्थ लोकतंत्र में मीडिया की विश्वसनीयता का होना बहुत बड़ी चीज़ है। आपातकाल में इंदिरा गांधी ने प्रेस पर घोषित तौर पर सेंसरशिप लगा रखी थी लेकिन फिर भी इंडियन एक्सप्रेस और कई दूसरे अखबारों ने विपरीत परिस्थितियों में भी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था।
आज हालात क्या है ? शाम को चैनलों पर मुर्गे लड़ाए जाते हैं। कौन सा एंकर या एंकरनी क्या सवाल करेगा या करेगी पहले से जाना जा सकता है। इसके साथ ही पत्रकारों के नाम पर पक्षकार बहस में भाग लेते हैं कोई सत्तारूढ़ दल का समर्थक होगा तो कोई विरोधी। अब पत्रकारिता नहीं पक्षकारिता का दौर है। कुछेक स्वतंत्र प्लेटफॉर्मों को छोड़ दें तो मीडिया की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है या कहें तो खत्म कर दी गई है। यह लोकतंत्र के लिए बहुत खतरनाक है।
समाज में विश्वसनीयता का संकट
भारत में विभिन्न धर्म, संप्रदाय, वर्ग और संस्कृतियों के लोग एकसाथ रहते आए हैं। मोटेतौर पर सभी एकदूसरे का सम्मान करते रहे हैं। बाबरी विध्वंस जैसी घटनाएं भी देश ने देखी, स्वर्ण मंदिर पर हमले को भी झेला। इन घटनाओं के राजनीतिक परिणाम भी देश ने देखे और उससे उबर भी गया। लेकिन पिछले 10- 12 सालों में जिस तरह से देश में सांप्रदायिक माहौल को हवा दी जा रही है और प्रशासन एवं पुलिस की जिस तरह की भूमिका सामने आई है उससे समाज में अविश्वास एवं दहशत का माहौल बना है। कल तक साथ रहने वाले लोग एक –दूसरे को शक से देखने लगे हैं। इस शक को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिए और हवा दी जा रही है। यह बात सिर्फ किसी एक संप्रदाय तक सीमित सीमित नहीं है बल्कि समाज में लगभग सभी धर्मों के बीच देखने में आ रही है।
लोकतंत्र के लिए समाज में विश्वसनीयता का संकट, संभव है राजनीतिक दलों को सूट करता हो, उनके निकम्मेपन पर पर्दा डालने का काम करता हो, लेकिन यह स्थिति एक देश और समाज के रूप में लोकतंत्र पर बहुत भारी खतरे का अंदेशा है।
भीड़तंत्र या लोकतंत्र ?
सवाल ये उठता है कि ऐेसे हालात किसके लिए फायदेमंद हैं ? बहुत साफ है, हालात को देखिए, न्यायपालिका को लेकर सवाल पैदा हो रहे हैं, मीडिया की विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है, समाज का आपसी भरोसा टूट चुका है। इसका फायदा कौन उठा सकता है, जाहिर है, जिसे समस्याओं का जवाब देना है। अपनी जिम्मेदारी से भागना हो तो मीडिया की विश्वसनीयता खत्म कर दो ताकि वो कल को कोई सही बात भी करे तो जनता उस पर शक करे। न्यायपालिका को सवालों के घेरे में खड़ा कर दो ताकि उस पर उंगली उठाई जा सके। समाज को एक दूसरे को लेकर शंकालु बना दो ताकि वो एकजुट होकर सवाल न पूछ सके।
सोचना होगा कि हमें लोकतंत्र की राह पर आगे बढ़ना है या फिर एक भीड़तंत्र में तब्दील होना है। लोकतंत्र में भरोसा ही व्य़वस्था का आधार होता है अगर वही खत्म हो गया तो बहुत बड़ा संकट पैदा हो जाएगा और इसके लिए जिम्मेदार कहीं न कहीं हम-आप भी होंगे।
(फोटो साभार- सोशल मीडिया)

