नई दिल्ली (गणंत्र भारत के लिए व्योमेश चंद्र जुगरान) : ‘गुलदार’ जैसे खूबसूरत नाम से संरक्षण की पैरवी को अपने खूने पंजे से शर्मसार करने वाला तेंदुआ उत्तराखंड में मानव व वन्यजीव संघर्ष को चरम तक ले आया है। अब वक्त आ गया है कि इस जानवर की चुनौती से निपटने के लिए वन्य जीव संरक्षण के दायरे से बाहर भी सोचा जाए! उत्तराखंड से लेकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक तेंदुओं के आक्रमण और आतंक के साथ ही इनकी वंशवृद्धि के आंकड़े चौंका रहे हैं। हालांकि भारत सरकार की ओर से देश में तेंदुओं की स्थिति पर जारी 2024 की रिपोर्ट में 2022 के आंकड़ों का हवाला देकर तेंदुओं की अनुमानित संख्या 13874 बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार तेंदुओं की सबसे अधिक तादाद मध्य प्रदेश में है, जहां ये करीब चार हजार के आसपास हैं। इसके बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु हैं। उत्तराखंड का नंबर पांचवां है, जहां इनकी उपस्थिति का आंकड़ा डेढ़ से दो हजार के बीच आंका गया है। लेकिन गैर-सरकारी स्रोतों का अनुमान है कि भारत में पिछले छह साल में तेंदुए 60 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं और इनकी संख्या 20 हजार पार कर चुकी है। विशेषज्ञों के मुताबिक अकेले उत्तराखंड और इसकी सीमा से लगे क्षेत्रों में ही इनकी तादाद कम से कम 5000 के आसपास है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर, पीलीभीत, सीतापुर, बहराइच, बलरामपुर और श्रावस्ती में दो साल में तेंदुओं और बाघों के हमले में 46 लोगों की जान जा चुकी है। इनमें 30 लोग सिर्फ बिजनौर में मारे गए। यहां गन्ने के खेतों में 500 से अधिक तेंदुओं की मौजूदगी का अनुमान है।
सबसे ज्यादा पीड़ित उत्तराखंड
जानमाल के नुकसान की दृष्टि से देखें तो उत्तराखंड तेंदुओं के आतंक से सबसे अधिक पीडि़त है। पिछले 20 सालों में तेंदुओं ने देश में यदि 700 से अधिक मानव हत्याएं की हैं तो इनमें 560 से अधिक सिर्फ उत्तराखंड में की हैं। गाय, बकरी व अन्य मवेशियों के मारे जाने की घटनाएं तो अनगिनत हैं। खासकर पहाड़ों में ग्रामीणों की जान पर बन आने, आजीविका से जुड़े मवेशियों के मारे जाने और बंदर व सूअर इत्यादि जंगली जानवरों के कारण चौपट हो चुकी खेती-किसानी के परिणामस्वरूप लोगों ने बड़ी संख्या में गांव छोड़ दिए हैं। ऐसे गांवों को ‘भुतहा गांव’ कहा जा रहा है और इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। पौड़ी जिले का जमूण गांव इस कतार में शामिल नवीनतम गांव है। यहां कभी 40 परिवार रहते थे। अनेकानेका कारणों से पिछले साल तक यहां सिर्फ एक परिवार रह रहा था जिसमें पति-पत्नी थे। पत्नी घर के समीप ही घास लेने गई तो बाघ झपट पड़ा। महिला का क्षत-विक्षत शव 200 मीटर दूर मिला। अब पति अकेला गांव में क्या करता!
उत्तराखंड के पहाड़ों में जमूण गांव जैसी कई त्रासद कहानियां हैं जहां जंगली जानवरों ने सारा जनजीवन छीन लिया है। पिछले माह 28 जून को पौड़ी जिले के नैनीडांडा ब्लॉक के बनासी तल्ली गांव में मवेशियों के लिए चारा लेने गई एक महिला तेंदुए का शिकार बनी। पौड़ी की इडवालस्यूं पट्टी के कमंद गांव में 13 मई को 58 साल के मोहन चन्द्र मलासी को तेंदुए ने मार डाला। इससे पहले पौड़ी जिले के ही बाड़ा, घुड़दौड़ी, बमठी और भटकोट गांवों में गुलदार ने जानें लीं। औणी गांव में गुलदार ने एक महिला पर हमला बोल दिया। हालांकि लोगों के शोर मचाने पर गुलदार भाग गया मगर महिला बुरी तरह घायल हो गई। इस घटना के विरोध में ग्रामीणों ने पौड़ी-श्रीनगर सड़क जाम कर दी। ऐसे दृश्य पहाड़ों में आम हो गए हैं। छिटपुट अंतराल के बाद कहीं न कहीं से गुलदार की खूनी वारदात की खबर सामने आ जाती हैं। यहां इस वर्ष अब तक तेंदुए 12 लोगों को अपना शिकार बना चुके हैं।
क्या मानवीय पलायन है एक वजह ?
हालांकि उत्तराखंड राज्य पलायन निवारण आयोग ने अपनी एक रिपोर्ट में राज्य के गांवों से हुए कुल मानवीय पलायन में सिर्फ 5.61 प्रतिशत पलायन के पीछे वन्यजीवों को वजह बताया है लेकिन गहराई में जाने पर पलायन की परिस्थिति का मूल कारण घूम फिरकर वन्यजीवों के आतंक पर ही आ टिकता है। सरकारें मानव और वन्यजीव संघर्ष के किसी ठोस व्यवहारिक समाधान की बात करने से कतराती रही हैं। उनका जोर सहजीवन जैसे अव्यावहारिक नजरिये से आगे नहीं बढ़ पाता। पूर्व चेतावनी प्रणाली, नियमित गश्त, त्वरित रक्षा, अधिकाधिक मुआवजा, वन्य जीवों के आवास स्थलों का उचित प्रबंधन, केजिंग, सोलर बायोफेंसिंग, ड्रोन कैमरे, सोलर लाइटें और झाड़ी काटने जैसे उपायों को जरूर गिनाया जाता है, मगर हर साल विकराल होती वनाग्नि, विकास व अन्य कार्यों के लिए वन्यक्षेत्र का वैध-अवैध अतिक्रमण, जंगलों का कटान, ग्राम प्रधानों व पंचायतों की अकमर्ण्यता, पर्यावरणीय कारणों से जंगल में शिकार की कमी और वहशी जानवरों के बदलते स्वभाव जैसे कारणों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। वन्यजीवों से होने वाली मौत पर उत्तराखंड में अब तक मात्र छह लाख की अनुग्रह राशि दी जाती थी। अब जाकर सरकार ने इसे 10 लाख किया है।
मानव बनाम वन्यजीव संघर्ष
उत्तराखंड में 14.77 प्रतिशत भूमि सरंक्षित श्रेणी में है। इसके अंतर्गत छह नेशनल पार्क, सात वन्यजीव अभियारण्य और चार संरक्षण आरक्षित क्षेत्र आते हैं। राष्ट्रीय औसत देखें तो यह आंकड़ा मात्र 5.27 प्रतिशत है। जाहिर है, उत्तराखंड सरकार इसे अपनी पर्यावरणीय प्रतिबद्धता से जोड़कर देखती आई है। पर, पहाड़ों में मानव बनाम वन्यजीव संघर्ष के हालात यदि एक खतरनाक स्थिति की ओर इशारा कर रहे हैं तो संतुलन साधना ही होगा। खासकर तेंदुओं की निरंतर बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने के उपाय खोजने होंगे। इसी साल 19 मई को गढ़वाल वन प्रभाग के प्रभागीय वनाधिकारी महातिम यादव ने वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की धारा 11(2) का हवाला देकर स्थानीय अखबारों में नोटिफिकेशन जारी किया है कि आत्मरक्षा में गुलदार या अन्य हिंसक जानवर को मारना या घायल करना कोई अपराध नहीं होगा। नोटिफिकेशन में स्पष्ट किया गया है कि इसके लिए कोई पृथक आदेश जारी करने की आवश्यकता नहीं है। असल में गुलदार के हमले की हर नई घटना के साथ पीडि़तों को गुस्सा यह कहकर फूटता आया है कि वन विभाग ने उन्हें हिंसक जानवर के रहमोकरम पर छोड़ दिया है और वे आत्मरक्षा में हथियार तक नहीं उठा सकते। वनाधिकारी का नोटिफिकेशन इसी के जवाब में है। लेकिन जानकारों का कहना है कि जो विभाग किसी क्षेत्र में आतंक का पर्याय बन चुके किसी गुलदार को मारने के लिए शिकारी को परमिट तक देने में आनाकानी करता है, वह आत्मरक्षा में लोगों को हिंसक जानवर को मारने की इजाजत भला क्यों देना चाहेगा! बेशक कानून में प्रावधान है, पर क्या यह साबित करना आसान होगा कि जानवर को आत्मरक्षा में मारा गया है! नोटिफिकेशन सिर्फ दिखावा और आंखों में धूल झोंकने के लिए है।
अलग नीति बनाने के जरूरत
तेंदुए के व्यवहार में आए बदलाव को करीब से जानने वाले जाने-माने शिकारी जॉय हुकिल जो अब तक 50 से अधिक नरभक्षियों को अपनी बंदूक का निशाना बना चुके हैं, साफ-साफ कहते हैं कि हमें बाघ और गुलदार में फर्क करना होगा और दोनों के लिए अलग-अलग पॉलिसी बनानी होगी। हुकिल अपने अनुभवों के हवाले से कहते हैं कि उत्तराखंड में एक साल में मनुष्यों पर झपटने वाले बिगड़ैल गुलदारों की संख्या मात्र सात-आठ होती है। इन्हें मारने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। वैसे भी जंगल में गुलदारों के प्रजनन की गति के सामने यह संख्या नगण्य है। हुकिल यह भी सुझाव देते हैं कि लोगों की निजी भूमि जो कि राज्य में मात्र करीब 23 प्रतिशत है, वहां हिंसक जानवरों को संरक्षण बिल्कुल नहीं मिलना चाहिए। वरना लोग कहां जाएंगे और कैसे आजीविका चला पाएंगे! वह बताते हैं कि उत्तराखंड में 71 प्रतिशत वन्यभूमि और सात से आठ प्रतिशत राजस्व भूमि है। सरकार अपने नियंत्रण वाली इस भूमि पर गुलदारों का संरक्षण करे, इस पर किसी को कोई आपत्ति नहीं है। अब समय आ गया है कि पहाड़ में ‘वन्यजीव बनाम मनुष्य’ जैसे संगीन संकट पर सभी संबद्ध पक्ष मिल बैठकर विचार करें और नए सिरे से नीति बनाएं।

