भारतीय अर्थव्यवस्था में पिछले कुछ समय से काफी उथल-पुथल मची हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संकट से उबरने के लिए कुछ सुझाव जनता के सामने रखे थे। लेकिन उन सुझावों को विशेषज्ञों ने अलग-अलग- नजरिए से देखा। इसी संदर्भ में, उत्थान विकास व अध्ययन संस्थान, यमुना नगर , हरियाणा के समाज विज्ञानी डॉ. प्रमोद कुमार बाजपेई का यह आलेख एक नई दृष्टि की तरफ इशारा करता है।
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कुछ समय पहले भारत दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था बनने की तरफ अग्रसर हो रहा था परन्तु अब वह लुढ़क कर छठवें स्थान पर पहुँच गया है। जापान व ब्रिटेन ने अपनी स्थिति पुनः हासिल कर ली है। जानकार इसके लिए डॉलर के मुकाबले गिरते रूपये को प्रमुख कारण बता रहें हैं। भारत की प्रति व्यक्ति आय 2813 अमेरिकन डॉलर है जब कि चीन की प्रति व्यक्ति आय 14874 अमेरिकन डॉलर है जो भारत की प्रति व्यक्ति आय की लगभग पांच गुना है। जब कि भारत की जीडीपी की वृद्धि दर लगभग साढ़े छह फीसदी बनी हुई है, हालाँकि विश्व बैंक सहित अनेक अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संगठनों ने भारत के दावों पर आशंका व्यक्त की है तथा आकड़ों की गुणवत्ता पर भी प्रश्न उठाये हैं।
विदेशी निवेशकों का डगमगाता भरोसा
एक समय था जब ‘म्यूचुअल फंड सही है’ का ढिंढोरा पीटा जाता था, लेकिन एसोसिएशन ऑफ़ म्यूच्यूअल फंड्स इन इण्डिया के आंकड़ों ने पोल खोल दी है। देशी और विदेशी निवेशकों का भरोसा इस कदर डगमगाया है कि वे अपनी सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान के एकाउंट बंद करके भाग रहे हैं। सिप बंद करने का अनुपात बढ़ कर मार्च और अप्रैल के महीनों में 100% से ऊपर चला गया था, जिसका अर्थ है कि नई शुरू होने वाली सिप से ज्यादा पुरानी सिप बंद या मैच्योर होने पर उससे पैसा निकाल लिया गया। उदाहरण के लिए, अप्रैल में 50.71 लाख नए सिप रजिस्ट्रेशन हुए, जबकि 51.29 लाख खाते बंद हुए। मई में भी यह रेशियो 95 प्रतिशत के करीब ऊँचे स्तर पर रहा। लगता है देश के चप्पे-चप्पे पर ‘सिप-क्लोजर’ का महोत्सव चल रहा है!
हद तो तब हो गई जब विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भी भारतीय बाजार को ‘बाय-बाय’ कहना शुरू कर दिया। अकेले वर्ष के शुरुआती 5 महीनों में ही विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाज़ारों से लगभग ₹2.87 लाख करोड़ (लगभग 39.94 बिलियन डॉलर) निकाल लिए, जिसने पिछले पूरे साल के ₹1.7 लाख करोड़ के रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है।
हमारे अपने देसी रिटेल निवेश के सिस्टम की नब्ज इतनी अच्छी तरह समझ गए हैं कि सरकार के सुनहरे दावों से उनका पूरा भरोसा ही उठ गया। अब इस महा-पलायन से शेयर बाजार के महारथी भी हैरान हैं। आखिर विदेशी मुद्रा बचेगी कैसे, जब विदेशी फंड लगातार बाहर जा रहे हों और रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट दर्ज कर रहा हो?
सोने की खपत घटाने की सलाह
इसी दबाव के बीच देशवासियों को सोने की चमक से दूर रहने की नसीहत दी जा रही है। वैसे आंकड़ों को देखें तो इस वित्त वर्ष में भारत का गोल्ड आयात बिल बढ़कर रिकॉर्ड 72.4 बिलियन डॉलर (लगभग ₹6.8 लाख करोड़) पर पहुंच गया, जो कुल आयात के 9 प्रतिशत से ज्यादा है। सरकार ने व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा के दबाव को नियंत्रित करने के लिए गोल्ड पर प्रभावी आयात शुल्क 6 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत (जीएसटी सहित कुल प्रभावी कर 18.4 प्रतिशत) कर दिया है, जब कि जनता से अपील की जा रही है कि एक साल तक सोना न खरीदें। भारी कीमतों के कारण सोने के आयात में मात्रा के हिसाब से लगभग 70 प्रतिशत तक की भारी गिरावट (लगभग 721 टन) के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में सोने के दामों में भारी बढ़ोत्तरी के चलते पिछले साल के मुकाबले इस बार विदेशी मुद्रा के भुगतान में 24 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गई है।
क्या पेट्रोल-डीजल से संभलेगा संकट
फिर बात आती है पेट्रोल और डीजल की, जिसे फूंक-फूंक कर इस्तेमाल करने की चेतावनी दी जा रही है। शायद नीति-निर्माताओं को लगता है कि आम आदमी के दफ्तर न जाने से विदेशों में बैठे तेल के सौदागरों को सदमा लगेगा और वे कच्चे तेल के दाम झट से गिरा देंगे।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण भारत के व्यापार घाटे का आंकड़ा 333.2 बिलियन डॉलर तक फैल चुका है। सरकार का यह सोचना वाकई कमाल है कि अगर हम काम-धाम छोड़कर वापस ‘वर्क फ्रॉम होम’ करने लग जाएं, कार पूलिंग करें या साइकिल पर चलने लग जाएँ और पेट्रोल का खर्च बचाएं, तो देश का विदेशी मुद्रा भंडार तुरंत संभल जाएगा।
भारत अपने कुल आयात का लगभग 25 प्रतिशत से 30 प्रतिशत हिस्सा केवल कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों पर खर्च करता है। वित्तीय वर्ष 2025-26 के कुल व्यापार घाटे में कच्चे तेल और ईंधन के आयात का शुद्ध योगदान लगभग 40 से 45 प्रतिशतके बीच रहा है। कैलेंडर वर्ष 2026 के हालिया महीनों में पश्चिम एशिया संकट के कारण तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है।
अब जनता को यह भी बताया जाएगा कि उन्हें कितने पराठे खाने चाहिए और कितना तेल बचाना है, ताकि विदेशों से आयात होने वाले पाम ऑयल और अन्य खाद्य तेलों का बिल कम हो सके। ऐसा लगता है कि अब रसोई में ‘तड़का’ लगाने के लिए भी देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार से राय लेनी पड़ेगी, क्योंकि आखिर मामला डॉलर बचाने का है।
जनता अपनी सेहत सुधारे न सुधारे, सरकार देश का करेंट अकाउंट डेफिसिट सुधारने के लिए कढ़ाई का तेल तक नापने को तैयार है। रसोई के तेल यानी कुकिंग ऑयल को लेकर भी सरकार किसी ‘न्यूट्रिशनिस्ट’ की भांति सलाह दे रही है।
कीटनाशकों के आयात से बचने के लिए जैविक खेती का रास्ता
इसके बाद आती है जैविक खेती की अद्भुत सलाह, जो हमारे किसानों के लिए किसी रासायनिक आपदा के बीच अमृत की तरह परोसी जा रही है। सरकार का मानना है कि जो किसान दशकों से महंगे यूरिया और आयातित कीटनाशकों के सहारे फसल उगा रहे हैं, वे अचानक से जादू की छड़ी घुमाएंगे और देश का भारी-भरकम फर्टिलाइजर आयात बिल शून्य हो जाएगा। लगता है कि अब खेतों में खाद डालने की जगह केवल आत्मनिर्भरता के नारों का जाप होगा और सारा का सारा विदेशी मुद्रा का संकट चुटकियों में गायब हो जाएगा।
विदेश यात्राओं और खर्चों पर ब्रेक का सुझाव
विदेश यात्राओं और विदेशों में होने वाली भव्य शादियों पर भी सीधा ब्रेक लगाने का अनोखा सुझाव आ गया है। विदेशों में जाकर छुट्टी मनाने वालों या वहां डेस्टिनेशन वेडिंग करने वालों से ऐसे बर्ताव किया जा रहा है जैसे वे देश का सारा डॉलर अपनी जेब में भरकर विदेश उड़ा ले जा रहे हों। इस घबराहट का असर ऐसा हुआ कि पीएम की इन अपीलों के तुरंत बाद शेयर बाजार एक ही दिन में 1,000 से अधिक अंक टूट गया और निवेशकों के ₹3.37 लाख करोड़ स्वाहा हो गए!
क्या ये उपाय सचमुच होंगे कारगर ?
विदेशी संस्थागत निवेशकों की ताबड़तोड़ बिकवाली, व्यवस्थित निवेश योजनाओं से रिटेल जनता का पलायन, और डॉलर के मुकाबले शतक छूता रुपया – इस सबका समाधान क्या आम आदमी की शुचिता पूर्ण जीवन शैली में निहित है या राष्ट्रीय उत्पादन बढ़ाने, गैर तकनीकी सामानों के आयात में कमी, गैर जरूरी खर्चों में कटौती, रोजगार के अवसरों में वृद्धि और भ्रष्टाचार पर प्रभावी रोक लगाकर संभव होगा?
अब देखना यह है कि ‘त्याग और शुचिता का यह नया मॉडल’ देश की जीडीपी को कितना ऊपर ले जाता है और जनता कब तक स्वर्ण और तेल के बिना डिजिटल इंडिया का आनंद लेती है? या फिर से आदिम काल की जीवन शैली अपनाकर बैल गाड़ी व आखेट युग कि तरफ प्रेरित होती है!!

